
<1권 목차>
- 하나의 모음
| 경 제목 | 경 번호 | 페이지 |
|---|
| 제1장 형상 등의 품 | A1:1:1~10 | 69 |
| 제2장 장애의 극복 품 | A1:2:1~10 | 73 |
| 제3장 다루기 힘든 품 | A1:3:1~10 | 78 |
| 제4장 제어되지 않은 품 | A1:4:1~10 | 81 |
| 제5장 바르게 놓이지 않은 품 | A1:5:1~10 | 83 |
| 제6장 손가락 튀기기 품 | A1:6:1~10 | 89 |
| 제7장 열심히 정진함 등의 품 | A1:7:1~10 | 92 |
| 제8장 선우 등의 품 | A1:8:1~10 | 96 |
| 제9장 방일 등의 품 | A1:9:1~17 | 98 |
| 제10장 비법 등의 품 | A1:10:1~42 | 100 |
| 제11장 비법 품 | A1:11:1~10 | 104 |
| 제12장 범계가 아닌 등의 품 | A1:12:1~20 | 106 |
| 제13장 한 사람 품 | A1:13:1~7 | 109 |
| 제14장 으뜸 품 | A1:14:1~80 | 112 |
| 제15장 불가능 품 | A1:15:1~28 | 146 |
| 제16장한 가지 법 품 | A1:16:1~10 | 150 |
| 제17장 씨앗 품 | A1:17:1~10 | 152 |
| 제18장 막칼리 품 | A1:18:1~17 | 155 |
| 제19장 잠부 섬 품 | A1:19:1~2 | 159 |
| 제20장 손가락 튀기기의 연속 품 | A1:20:1~182 | 163 |
| 제21장 몸에 대한 마음챙김 품 | A1:21:1~70 | 175 |
- 둘의 모음
Ⅰ. 첫 번째 50개 경들의 묶음
제1장 형벌 품 | 경 번호 | 페이지 |
|---|
| 허물 경 | A2:1:1 | 185 |
| 노력 경 | A2:1:2 | 188 |
| 태움 경 | A2:1:3 | 188 |
| 태우지 않음 경 | A2:1:4 | 189 |
| 통찰했음 경 | A2:1:5 | 190 |
| 족쇄 경 | A2:1:6 | 191 |
| 검음 경 | A2:1:7 | 192 |
| 흼 경 | A2:1:8 | 192 |
| 부인 경 | A2:1:9 | 193 |
| 안거에 들어감 경 | A2:1:10 | 194 |
제2장 대중공사[諍事] 품 | 경 번호 | 페이지 |
|---|
| 힘 경 | A2:2:1 | 195 |
| 깨달음의 구성요소 경 | A2:2:2 | 196 |
| 선(禪) 경 | A2:2:3 | 197 |
| 설법 경 | A2:2:4 | 198 |
| 대중공사 경 | A2:2:5 | 199 |
| 법답지 못한 행위 경 | A2:2:6 | 201 |
| 행하지 않음 경 | A2:2:7 | 202 |
| 분명함 경 | A2:2:8 | 204 |
| 불선법 경 | A2:2:9 | 205 |
| 어지럽힘 경 | A2:2:10 | 206 |
제3장 어리석은 자 품 | 경 번호 | 페이지 |
|---|
| 어리석은 자 경 | A2:3:1 | 207 |
| 사악한 자 경 | A2:3:2 | 207 |
| 말씀 경1 | A2:3:3 | 208 |
| 말씀 경2 | A2:3:4 | 208 |
| 뜻을 알아내어야 함 경1 | A2:3:5 | 209 |
| 뜻을 알아내어야 함 경2 | A2:3:6 | 210 |
| 숨기는 자 경 | A2:3:7 | 210 |
| 견해 경 | A2:3:8 | 210 |
| 이유 경 | A2:3:9 | 211 |
| 영지(靈知)의 일부 경 | A2:3:10 | 211 |
| 제4장 평등한 마음 품 | 경 번호 | 페이지 |
|---|
| 바탕 경 | A2:4:1 | 213 |
| 은혜에 보답하지 못함 경 | A2:4:2 | 214 |
| 무슨 교설 경 | A2:4:3 | 215 |
| 공양받아 마땅함 경 | A2:4:4 | 216 |
| 족쇄 경 | A2:4:5 | 217 |
| 아라마단다 경 | A2:4:6 | 223 |
| 깐다나야나 경 | A2:4:7 | 226 |
| 도둑 경 | A2:4:8 | 227 |
| 도닦음 경 | A2:4:9 | 228 |
| 자구(字句) 경 | A2:4:10 | 229 |
제5장 회중 품 | 경 번호 | 페이지 |
|---|
| 들뜸 경 | A2:5:1 | 230 |
| 파당지음 경 | A2:5:2 | 231 |
| 훌륭함 경 | A2:5:3 | 231 |
| 성스러움 경 | A2:5:4 | 232 |
| 찌꺼기 경 | A2:5:5 | 233 |
| 훈련됨 경 | A2:5:6 | 234 |
| 세속적인 것을 중시함 경 | A2:5:7 | 236 |
| 비뚤어짐 경 | A2:5:8 | 239 |
| 법답지 못함 경 | A2:5:9 | 240 |
| 법답지 않게 논의함 경 | A2:5:10 | 240 |
Ⅱ. 두 번째 50개 경들의 묶음
제6장 사람 품 | 경 번호 | 페이지 |
|---|
| 이익 경 | A2:6:1 | 242 |
| 경이로움 경 | A2:6:2 | 242 |
| 고통 경 | A2:6:3 | 243 |
| 탑을 세울 만함 경 | A2:6:4 | 243 |
| 부처 경 | A2:6:5 | 243 |
| 천둥번개 경1 | A2:6:6 | 244 |
| 천둥번개 경2 | A2:6:7 | 244 |
| 천둥번개 경3 | A2:6:8 | 245 |
| 낀나라 경 | A2:6:9 | 245 |
| 출산 경 | A2:6:10 | 246 |
| 교계 경 | A2:6:11 | 246 |
| 내 뱉음 경 | A2:6:12 | 249 |
제7장 행복 품 | 경 번호 | 페이지 |
|---|
| 재가 경 | A2:7:1 | 250 |
| 감각적 욕망 경 | A2:7:2 | 250 |
| 재생의 근거 경 | A2:7:3 | 251 |
| 번뇌 경 | A2:7:4 | 251 |
| 세속 경 | A2:7:5 | 251 |
| 성스러움 경 | A2:7:6 | 252 |
| 육체적 행복 경 | A2:7:7 | 252 |
| 희열 경 | A2:7:8 | 253 |
| 기쁨 경 | A2:7:9 | 253 |
| 삼매 경1 | A2:7:10 | 253 |
| 삼매 경2 | A2:7:11 | 254 |
| 삼매 경3 | A2:7:12 | 254 |
| 삼매 경4 | A2:7:13 | 254 |
제8장 표상 품 | 경 번호 | 페이지 |
|---|
| 표상 경 | A2:8:1 | 255 |
| 동기 경 | A2:8:2 | 255 |
| 원인 경 | A2:8:3 | 256 |
| 의도적 행위 경 | A2:8:4 | 256 |
| 조건 경 | A2:8:5 | 256 |
| 물질 경 | A2:8:6 | 256 |
| 느낌 경 | A2:8:7 | 257 |
| 인식 경 | A2:8:8 | 257 |
| 알음알이 경 | A2:8:9 | 257 |
| 형성된 것 경 | A2:8:10 | 258 |
제9장 법품 | 경 번호 | 페이지 |
|---|
| 해탈 경 | A2:9:1 | 258 |
| 노력 경 | A2:9:2 | 258 |
| 정신[名] 경 | A2:9:3 | 259 |
| 영지(靈知) 경 | A2:9:4 | 259 |
| 견해 경 | A2:9:5 | 259 |
| 양심 없음 경 | A2:9:6 | 260 |
| 양심 경 | A2:9:7 | 260 |
| 훈계를 받아 들이지 않음 경 | A2:9:8 | 260 |
| 훈계를 잘 받아들임 경 | A2:9:9 | 261 |
| 요소 경 | A2:9:10 | 261 |
| 범계 경 | A2:9:11 | 261 |
제10장 어리석은 자 품 | 경 번호 | 페이지 |
|---|
| 어리석은 자 경 | A2:10:1 | 262 |
| 현명한 자 경 | A2:10:2 | 262 |
| 적당함 경1 | A2:10:3 | 263 |
| 적당함 경2 | A2:10:4 | 263 |
| 범계 경1 | A2:10:5 | 263 |
| 범계 경2 | A2:10:6 | 264 |
| 법 아님 경1 | A2:10:7 | 264 |
| 법 아님 경2 | A2:10:8 | 264 |
| 율 경1 | A2:10:9 | 264 |
| 율 경2 | A2:10:10 | 265 |
| 후회 경1 | A2:10:11 | 265 |
| 후회 경2 | A2:10:12 | 265 |
| 적당함 경1 | A2:10:13 | 265 |
| 적당함 경2 | A2:10:14 | 266 |
| 범계 경1 | A2:10:15 | 266 |
| 범계 경2 | A2:10:16 | 266 |
| 법 아님 경1 | A2:10:17 | 267 |
| 법 아님 경2 | A2:10:18 | 267 |
| 율 경1 | A2:10:19 | 267 |
| 율 경2 | A2:10:20 | 267 |
Ⅲ. 세 번째 50개 경들의 묶음
제11장 희망 품 | 경번호 | 페이지 |
|---|
| 희망 경 | A2:11:1 | 269 |
| 사람 경1 | A2:11:2 | 269 |
| 사람 경2 | A2:11:3 | 270 |
| 사람 경3 | A2:11:4 | 270 |
| 사람 경4 | A2:11:5 | 270 |
| 조건 경1 | A2:11:6 | 271 |
| 조건 경2 | A2:11:7 | 271 |
| 조건 경3 | A2:11:8 | 271 |
| 조건 경4 | A2:11:9 | 271 |
| 범계 경1 | A2:11:10 | 272 |
| 범계 경2 | A2:11:11 | 272 |
| 범계 경3 | A2:11:12 | 272 |
제12장 발원 품 | 경 번호 | 페이지 |
|---|
| 발원 경1 | A2:12:1 | 273 |
| 발원 경2 | A2:12:2 | 273 |
| 발원 경3 | A2:12:3 | 273 |
| 발원 경4 | A2:12:4 | 274 |
| 파 엎음 경1 | A2:12:5 | 274 |
| 파 엎음 경2 | A2:12:6 | 275 |
| 파 엎음 경3 | A2:12:7 | 276 |
| 파 엎음 경4 | A2:12:8 | 276 |
| 자기 마음 경 | A2:12:9 | 277 |
| 분노 경 | A2:12:10 | 277 |
| 길들임 경 | A2:12:11 | 278 |
제13장 보시 품 | 경 번호 | 페이지 |
|---|
| 보시 경 | A2:13:1 | 278 |
| 헌공 경 | A2:13:2 | 278 |
| 관대함 경 | A2:13:3 | 279 |
| 너그러움 경 | A2:13:4 | 279 |
| 향유 경 | A2:13:5 | 279 |
| 함께 향유함 경 | A2:13:6 | 280 |
| 나누어 가짐 경 | A2:13:7 | 280 |
| 도움 경 | A2:13:8 | 280 |
| 호의 경 | A2:13:9 | 281 |
| 동정 경 | A2:13:10 | 281 |
제14장 환영(歡迎) 품 | 경 번호 | 페이지 |
|---|
| 환영 경 | A2:14:1 | 281 |
| 친저한 환영 경 | A2:14:2 | 282 |
| 구함 경 | A2:14:3 | 282 |
| 추구 경 | A2:14:4 | 282 |
| 애써 구함 경 | A2:14:5 | 283 |
| 예배 경 | A2:14:6 | 283 |
| 손님을 환대함 경 | A2:14:7 | 283 |
| 성취 경 | A2:14:8 | 284 |
| 번영 경 | A2:14:9 | 284 |
| 보배 경 | A2:14:10 | 284 |
| 축적 경 | A2:14:11 | 285 |
| 충만 경 | A2:14:12 | 285 |
| 제15장 증득 품 | A2:15:1~17 | 285 |
| 제16장 분노 품 | A2:16:1~100 | 288 |
제17장 율 등의 품 | 경 번호 | 페이지 |
|---|
| 학습계목 경 | A2:17:1 | 292 |
| 빠띠목카 경 | A2:17:2 | 293 |
| 최상의 지혜로 앎 경 | A2:17:3 | 297 |
| 철저히 앎 경 | A2:17:4 | 298 |
| 철저히 앎 경의/반복 | A2:17:5 | 298 |
- 셋의 모음
Ⅰ. 첫 번째 50개 경들의 묶음
제1장 어리석은 자 품 | 경 번호 | 페이지 |
|---|
| 어리석은 자 경 | A3:1 | 303 |
| 특징 경 | A3:2 | 305 |
| 생각 경 | A3:3 | 306 |
| 잘못 경 | A3:4 | 307 |
| 지혜 없음 경 | A3:5 | 308 |
| 해로움[不善] 경 | A3:6 | 308 |
| 비난받아 마땅함 경 | A3:7 | 309 |
| 악의에 참 경 | A3:8 | 310 |
| 나쁜행위 경 | A3:9 | 310 |
| 더러움 경 | A3:10 | 311 |
제2장 마차공 품 | 경 번호 | 페이지 |
|---|
| 유명함 경 | A3:11 | 313 |
| 기억 경 | A3:12 | 314 |
| 희망 없음 경 | A3:13 | 315 |
| 전륜성왕 경 | A3:14 | 319 |
| 빠께따나 경 | A3:15 | 321 |
| 티 없음 경 | A3:16 | 324 |
| 자기를 해침 경 | A3:17 | 327 |
| 신의 세계 경 | A3:18 | 327 |
| 상인 경1 | A3:19 | 328 |
| 상인 경2 | A3:20 | 330 |
제3장 사람 품 | 경 번호 | 페이지 |
|---|
| 몸으로 체험한 자 경 | A3:21 | 333 |
| 환자 경 | A3:22 | 336 |
| 의도적 행위 경 | A3:23 | 338 |
| 크게 도움 됨 경 | A3:24 | 340 |
| 곪은 상처 경 | A3:25 | 341 |
| 섬겨야 함 경 | A3:26 | 342 |
| 넌더리 쳐야 함 경 | A3:27 | 345 |
| 꽃과 같은 말 경 | A3:28 | 347 |
| 장님 경 | A3:29 | 349 |
| 거꾸로 놓은 항아리 경 | A3:30 | 351 |
제4장 저승사자 품 | 경 번호 | 페이지 |
|---|
| 범천과 함께함 경 | A3:31 | 355 |
| 아난다 경 | A3:32 | 356 |
| 원인 경 | A3:33 | 360 |
| 알라와까 경 | A3:34 | 363 |
| 저승사자 경 | A3:35 | 366 |
| 사대천왕 경1 | A3:36 | 373 |
| 사대천왕 경2 | A3:37 | 376 |
| 편안함 경 | A3:38 | 379 |
| 자부심 경 | A3:39 | 381 |
| 우선함 경 | A3:40 | 383 |
제5장 소 품 | 경 번호 | 페이지 |
|---|
| 현존 경 | A3:41 | 387 |
| 경우 경 | A3:42 | 387 |
| 다른 자들 경 | A3:43 | 388 |
| 설함 경 | A3:44 | 389 |
| 현자 경 | A3:45 | 389 |
| 계를 지님 경 | A3:46 | 390 |
| 유위 경 | A3:47 | 390 |
| 산왕 경 | A3:48 | 392 |
| 근면 경 | A3:49 | 393 |
| 대도(大盜) 경 | A3:50 | 393 |
Ⅱ. 큰 50개 경들의 묶음
제6장 바라문 품 | 경 번호 | 페이지 |
|---|
| 두 바라문 경1 | A3:51 | 396 |
| 두 바라문 경2 | A3:52 | 397 |
| 어떤 바라문 경 | A3:53 | 399 |
| 유행승 경 | A3:54 | 400 |
| 열반 경 | A3:55 | 404 |
| 부자 경 | A3:56 | 406 |
| 왓차곳따 경 | A3:57 | 409 |
| 띠깐나 경 | A3:58 | 413 |
| 자눗소니 경 | A3:59 | 419 |
| 상가라와 경 | A3:60 | 423 |
제7장 대품 | 경 번호 | 페이지 |
|---|
| 외도의 주장 경 | A3:61 | 433 |
| 두려움 경 | A3:62 | 443 |
| 웨나가뿌라 경 | A3:63 | 446 |
| 사라바 경 | A3:64 | 453 |
| 깔라마 경 | A3:65 | 459 |
| 살하 경 | A3:66 | 469 |
| 대화의 주제 경 | A3:67 | 476 |
| 외도 경 | A3:68 | 480 |
| 불선근 경 | A3:69 | 484 |
| 팔관재계 경 | A3:70 | 490 |
제8장 아난다 품 | 경 번호 | 페이지 |
|---|
| 찬나 경 | A3:71 | 506 |
| 아지와까 경 | A3:72 | 509 |
| 마하나마 경 | A3:73 | 512 |
| 니간타 경 | A3:74 | 516 |
| 격려해야 함 경 | A3:75 | 520 |
| 존재 경 | A3:76 | 522 |
| 의도 경 | A3:77 | 524 |
| 시중 듦 경 | A3:78 | 525 |
| 향기 경 | A3:79 | 527 |
| 아비부 경 | A3:80 | 529 |
제9장 사문 품 | 경 번호 | 페이지 |
|---|
| 사문 경 | A3:81 | 533 |
| 들판 경 | A3:82 | 534 |
| 왓지의 후예 경 | A3:83 | 535 |
| 유학 경 | A3:84 | 536 |
| 외움 경1 | A3:85 | 537 |
| 외움 경2 | A3:86 | 540 |
| 외움 경3 | A3:87 | 543 |
| 공부지음 경1 | A3:88 | 545 |
| 공부지음 경2 | A3:89 | 546 |
| 빵까다 경 | A3:90 | 548 |
제10장 소금덩이 품 | 경 번호 | 페이지 |
|---|
| 서둘러 할 것 경 | A3:91 | 554 |
| 멀리 여읨 경 | A3:92 | 555 |
| 으뜸가는 회중 경 | A3:93 | 559 |
| 좋은 혈통 경1 | A3:94 | 561 |
| 좋은 혈통 경2 | A3:95 | 562 |
| 좋은 혈통 경3 | A3:96 | 564 |
| 나무껍질로 만든 옷 경 | A3:97 | 565 |
| 옷감 경 | A3:98 | 567 |
| 소금덩이 경 | A3:99 | 569 |
| 불순물 제거하는 자 경 | A3:100 | 576 |
Ⅲ. 작은 50개 경들의 모음
| 제11장 바른 깨달음 품 | 경 번호 | 페이지 |
|---|
| 이전의 탐구 경 | A3:101 | 585 |
| 달콤함 경 | A3:102 | 587 |
| 슬피 욺 경 | A3:103 | 589 |
| 물림 없음 경 | A3:104 | 590 |
| 누각 경1 | A3:105 | 590 |
| 누각 경2 | A3:106 | 592 |
| 원인 경1 | A3:107 | 593 |
| 원인 경2 | A3:108 | 594 |
| 원인 경3 | A3:109 | 595 |
| 원인 경4 | A3:110 | 597 |
| 제12장 악처로 향하는 자 품 | 경 번호 | 페이지 |
|---|
| 악처로 향하는 자 경 | A3:111 | 599 |
| 얻기 어려움 경 | A3:112 | 599 |
| 측량할 수 없음 경 | A3:113 | 600 |
| 무변처 경 | A3:114 | 601 |
| 결함 경 | A3:115 | 603 |
| 티 없음 경 | A3:116 | 605 |
| 행위 경 | A3:117 | 607 |
| 깨끗함 경1 | A3:118 | 608 |
| 깨끗함 경2 | A3:119 | 609 |
| 완성 경 | A3:120 | 611 |
| 제13장 꾸시나라 품 | 경 번호 | 페이지 |
|---|
| 꾸시나라 경 | A3:121 | 613 |
| 다툼 경 | A3:122 | 615 |
| 고따마까 경 | A3:123 | 617 |
| 바란두 경 | A3:124 | 619 |
| 핫타까 경 | A3:125 | 622 |
| 더러움 경 | A3:126 | 624 |
| 아누룻다 경1 | A3:127 | 626 |
| 아누룻다 경2 | A3:128 | 627 |
| 비밀리 경 | A3:129 | 628 |
| 바위에 새김 경 | A3:130 | 629 |
| 제14장 무사 품 | 경 번호 | 페이지 |
|---|
| 무사 경 | A3:131 | 631 |
| 회중 경 | A3:132 | 633 |
| 친구 경 | A3:133 | 633 |
| 출현 경 | A3:134 | 634 |
| 머리카락으로 만든 옷감 경 | A3:135 | 635 |
| 구족 경 | A3:136 | 636 |
| 망아지 경 | A3:137 | 636 |
| 좋은 말(馬) 경 | A3:138 | 640 |
| 혈통 좋은 말 경 | A3:139 | 642 |
| 공작 보호구역 경 | A3:140 | 644 |
제15장 길상 품 | 경 번호 | 페이지 |
|---|
| 해로운 법 경 | A3:141 | 646 |
| 비난받아 마땅함 경 | A3:142 | 646 |
| 비뚤어짐 경 | A3:143 | 647 |
| 더러움 경 | A3:144 | 648 |
| 해침 경1 | A3:145 | 648 |
| 해침 경2 | A3:146 | 649 |
| 해침 경3 | A3:147 | 649 |
| 해침 경4 | A3:148 | 650 |
| 예배 경 | A3:149 | 651 |
| 오전 경 | A3:150 | 651 |
제16장 나체 수행자 품 | 경 번호 | 페이지 |
|---|
| 나체 수행자 경1 | A3:151 | 653 |
| 나체 수행자 경2 | A3:152 | 656 |
| 생명을 죽임 경 | A3:153 | 658 |
| 주지 않은 것을 가짐 경 | A3:154 | 658 |
| 삿된 음행 경 | A3:155 | 659 |
| 거짓말 경 | A3:156 | 659 |
| 이간질 경 | A3:157 | 660 |
| 욕설 경 | A3:158 | 660 |
| 잡담 경 | A3:159 | 660 |
| 간탐 경 | A3:160 | 661 |
| 악의 경 | A3:161 | 661 |
| 삿된 견해 경 | A3:162 | 661 |
| 탐욕의 반복 경 | A3:163 | 662 |
<앙굿따라 니까야 역자 서문>
1. 들어가는 말 – 법을 의지하여 머물리라
"아무도 존중할 사람이 없고 의지할 사람이 없이 머문다는 것은 괴로움이다. 참으로 나는 어떤 사문이나 바라문을 존경하고 존중하고 의지하여 머물러야 하는가?"(A4:21)
본서 제2권 「우루웰라 경」1(A4:21)에 나타나는 세존의 성찰이다. 세존께서는 깨달음을 성취하신 뒤 아직 아무에게도 자신의 깨달음을 드러내지 않으셨을 때에1) 우루웰라의 네란자라 강둑에 있는 염소치기의 니그로다 나무 아래에 앉아서 과연 나는 누구를 의지할 것인가를 두고 진지하게 사유하셨다. 경에 의하면 세존께서는 자신이 의지할 자를 찾아서 신들을 포함하고 마라를 포함하고 사문 · 바라문을 포함한 하늘과 인간의 모든 세상 모든 존재를 다 살펴보셨지만 세존께서 구족한 계(戒)와 삼매[定]와 통찰지[慧]와 해탈보다 더 잘 구족한 자를 그 누구도 그 어디에서도 보지 못했다고 한다. 그래서 마침내 세존께서는 이 문제에 대해서 이렇게 결론지으신다.
"참으로 나는 내가 바르게 깨달은 바로 이 법을 존경하고 존중하고 의지하여 머물리라."(A4:21)
그리고 "법을 의지하여 머물리라."는 이러한 부처님의 태도는 부처님이 전법과 교화를 하신 45년간 내내 "법을 의지처로 삼고[法歸依] 법을 섬으로 삼아라[法燈明]."는 가르침과 "자신을 의지처로 삼고[自歸依] 자신을 섬으로 삼아라[自燈明]."는 가르침으로 이어지고 있음을 잘 알고 있다. 우리는 또한 세존께서 반열반하시기 직전에 남기신 첫 번째 유훈도 바로 법과 율이 그대들의 스승이 될 것이라는 것도 잘 알고 있다.2) 세존께서는 말씀하셨다.
"아난다여, 아마 그대들에게 '스승의 가르침은 이제 끝나버렸다. 이제 스승은 계시지 않는다.'라는 이런 생각이 들지도 모른다. 아난다여, 그러나 그렇게 생각해선 안 된다. 아난다여, 내가 가고 난 후에는 내가 그대들에게 가르치고 천명한 법과 율이 그대들의 스승이 될 것이다."(「대반열반경」(D16) §6.1)
이처럼 세존께서는 깨달음을 성취하신 직후에도 스스로 깨달은 법을 의지해서 머물리라고 하셨고, 45년간 제자들에게 설법하실 때에도 법을 강조하셨으며 영원히 사바세계에서 자취를 감추시는 반열반의 마지막 자리에서도 법이 그대들의 스승이 될 것이라 유훈하셨다. 그러므로 세존께서 반열반하고 계시지 않는 지금에 사는 우리가 뼈가 시리고 가슴이 사무치게 존중하면서 배우고 궁구하고 이해하고 실천해야 할 것은 바로 이 법(dhamma)이 아니고 그 무엇이겠는가?
2. 일차합송과 니까야들
"법과 율이 그대들의 스승이 될 것이다."라는 부처님의 유훈을 가슴 깊이 새긴 부처님의 직계제자들은 부처님의 입멸이라는 가슴이 무너지는 슬픔을 뒤로하고 부처님의 존체(尊體, sarīra, 舍利)요 부처님의 진정한 몸[法身]이며 부처님의 화현(아와따라, avatāra)인 세존의 가르침을 결집하는 일에 몰입하였다. 그들은 장장 일곱 달 동안 합송에 몰두하여 세존이 남기신 법과 율을 결집하였던 것이다.
부처님께서는 "법과 율이 그대들의 스승이 될 것이다."라고 하셨다. 그래서 그들은 일단 법의 바구니(Dhamma-Pitaka = Sutta-Pitaka, 經藏)와 율의 바구니(Vinaya-Pitaka, 律藏)라는 두 개의 바구니를 먼저 설정하였다. 그 가운데서 율의 바구니부터 먼저 채우기로 결의하였는데 합송에 참석한 아라한들은 "마하깟사빠 존자시여, 율은 부처님 교법의 생명(āyu)입니다. 율이 확립될 때 교법도 확립됩니다. 그러므로 율을 첫 번째로 합송해야 합니다."(DA.i.11)라고 결정하였기 때문이다.
그런 다음 법의 바구니를 채우기 시작하였는데 법의 바구니는 다시 다섯 개의 니까야(Nikāya)로 나누어서 합송하였다. 일차합송에 참여한 아라한들이 부처님 가르침을 정리하는 제일 첫 번째 기준은 길이와 주제와 숫자의 세 가지였다. 그들은 부처님 가르침을 연대기적으로 정리하는 데는 큰 관심을 보이지 않았다. 그래서 그들은 부처님의 가르침이나 직계제자들의 설법들 가운데서 그 길이가 긴 경들 34개를 모아서 『디가 니까야』(長部)에 담았고 중간 길이로 설하신 가르침들 152개를 합송해서 『맛지마 니까야』(中部)에 담았다. 그다음에는 설법의 주제별로 56개의 주제를 설정한 뒤 그 주제에 해당하는 경들을 함께 모아서(saṁyutta) 『상윳따 니까야』(相應部)를 완성하였다. 그리고 경들에 나타나는 가르침의 숫자[法數]에 주목하여 모두 하나부터 열하나까지의 법수를 가진 모음을 분류한 뒤 경들을 숫자별로 모아서 『앙굿따라 니까야』(增支部)에 합창으로 노래를 불러[合誦] 채워 넣었다.
이런 방법으로 『디가 니까야』 등 네 가지 니까야를 완성한 뒤에 그외에 남은 부처님 말씀이나 여러 스님들의 설법이나 일화나 게송 등은 『쿳다까 니까야』(小部)에 채워 넣었다.
이렇게 합송하여 공인된 『디가 니까야』(장부)에는 모두 34개의 경들이 포함되어 있고 그 분량은 64바나와라3)이며 아난다 존자의 제자들에게 부촉해서 그분들이 계승해 가도록 하였다. 『맛지마 니까야』(중부)에는 모두 152개의 경들이 포함되어 있고 분량은 80바나와라이며 사리뿟따 존자의 제자들이 계승하도록 결의하였다. 『상윳따 니까야』(상응부)에는 모두 7762개의 경들이 포함되어 있고 분량은 100바나와이며 마하깟사빠 존자의 제자들에게 부촉하여 전승하도록 하였다. 『앙굿따라 니까야』(증지부)에는 모두 9557개의 경들이 포함되어 있고 120바나와라 분량이며 아누룻다 존자의 제자들에게 부촉해서 전승하도록 하였다 한다.4)
3. 주제와 숫자가 중복될 경우의 결집 원칙
한편 가르침의 주제와 그 주제의 법수는 중복이 되는 경우가 많다. 예를 들면 사성제는 진리[諦, sacca]라는 주제와도 관련이 있고 넷이라는 숫자와도 관련이 있다. 그러므로『상윳따 니까야』의 「진리 상응」(S56)과도 관련이 있고 『앙굿따라 니까야』의 「넷의 모음」(A4)과도 관련이 있다. 마찬가지로 네 가지 마음챙김의 확립(사념처)은 마음챙김의 확립이라는 주제와도 관련이 있고 넷이라는 숫자와도 관련이 있다. 그러므로 『상윳따 니까야』의 「염처 상응」(S47)으로 결집할 수도 있었고 『앙굿따라 니까야』의 「넷의 모음」에도 포함시킬 가능성이 있었다.
그러나 이런 경우에는 『상윳따 니까야』를 먼저 결집하였기 때문에 『상윳따 니까야』에서 설정한 56개의 주제에 해당되는 주제를 담고 있는 경들은 『상윳따 니까야』 로 먼저 결집을 하였고 『상윳따 니까야』에서 설정한 56개의 주제와 관련 없는 주제를 담고 있는 경들은 그 주제의 법수에 따라서 『앙굿따라 니까야』에 포함시켰다. 그래서 사성제에 관한 경들은 거의 모두 『상윳따 니까야』의 「진리 상응」에 포함되어 있고 『앙굿따라 니까야』의 「넷의 모음」에는 거의 나타나지 않으며, 사념처나 사정근이나 사여의족 등도 마찬가지이다.
그러나『상윳따 니까야』에는 탐 · 진 · 치에 관한 상응이 따로 존재하지 않기 때문에 탐 · 진 · 치에 관계된 가르침은 『앙굿따라 니까야』의 「셋의 모음」에 포함되어 결집되었다.
그 외 법과 율을 율장과 경장과 논장의 삼장(三藏, Tipiṭaka)으로 조직한 상세한 내용은 초기불전연구원에서 역출한 『디가 니까야』 제3권의 부록으로 번역해서 소개하고 있는 『디가 니까야 주석서』서문의 §§30~48에 잘 나타나 있으니 참조하기 바란다. 이 부분은 상좌부 전통에서 본 삼장의 조직체계를 분명하게 밝히고 있기 때문에 역자의 보충 설명은 더 이상 필요하지 않을 것이다. 그리고 『디가 니까야』 제1권 역자 서문에서도 법과 율의 결집에 대해서 상세하게 논하였는데 그곳을 참조하기 바란다.
4. 『앙굿따라 니까야』 (증지부)란 무엇인가
주석서에 의하면 『앙굿따라 니까야』는 4부 니까야 가운데 맨 마지막에 결집한 것이다. 문자적으로 앙굿따라(aṅguttara)는 앙가(aṅga)와 웃따라(uttara)가 합성된 단어로 '구성요소(aṅga)가 [하나씩] 더 높아지는 것(uttara)'이라는 뜻이다. 그래서 『디가니까야 주석서』에서는 "어떤 것이 『앙굿따라 니까야』 인가? [주요 주제의 숫자가] 하나씩, 하나씩 증가하면서 설해진 「마음의 유혹에 대한 경」(A1:1:1) 등의 9557개의 경들이다."(DA.i.15)라고 정의하고 있으며 다시 "「하나의 모음」(Eka-nipāta)과 「둘의 모음」(Dukka-nipāta) 등의 모음에 의한 결집"(DA.i.25)이라고 정의하고 있다. 그래서 『앙굿따라 니까야』를 일본에서는 증지부(增支部)로 옮겼다.
『앙굿따라 니까야』에서는 같은 법수를 포함하고 있는 경들을 모은것을 니빠따(Nipāta)라는 술어로 표현하고 있다. 니빠따는 ni(아래로)+√pat(to fall)에서 파생된 명사로 '아래로 떨어뜨린 것'이라는 일차적인 의미에서 유사한 것끼리 모은 것이라는 의미를 나타내고 있다. 역자는 '모음'으로 옮겼다.
이처럼 『앙굿따라 니까야』(증지부)는 하나와 관련된 가르침부터 열하나와 관련된 가르침까지 그 숫자가 뒤의 모음으로 갈수록 하나씩 증가하는 방법으로 모아서 모두 11개의 모음으로 분리해서 결집하였다. 그래서 『앙굿따라 니까야 주석서』도 『앙굿따라 나까야』는 「하나의 모음」(A1), 「둘의 모음」(A2), …「열하나의 모음」(A11)이라는 11개의 모음이 있고 9557개의 경들이 포함되어 있다고 설명하고 있다.(AA.i.3) 그래서 초기불전연구원에서는 본서를 출간하면서 "숫자별로 모은 경"이라는 부제를 달았다.
한편 숫자가 증가하는 방식의 모음은 이미 『디가 니까야』 「합송경」(D33)과 「십상경」(D34)에도 채용되었다. 「합송경」 은 하나의 주제부터 열의 주제까지 모두 230개의 가르침을 숫자별로 모아서 사리뿟따 존자가 비구대중들에게 설한 가르침이며, 「십상경」 도 역시 사리뿟따 존자가 설한 것인데 각각의 숫자별로 10개의 주제를 설정한 뒤 (1×10) + (2×10) + … + (10×10)하여 모두 550개의 가르침이 10가지 주제 하에 일목요연하게 정리되어 설해지고 있다.
그리고 이러한 숫자별 모음은 이미 인도의 여러 종교계 혹은 사상계에서 일반적으로 통용되던 교설의 분류방법이기도 하다.
부처님 말년에 이를수록 부처님의 가르침은 다 기억하기 힘들 정도로 방대해졌다. 이러한 많은 가르침을 어떻게 모아서 노래하고 기억하여 후대로 전승해 줄 것인가는 직계제자들에게는 중요한 문제가 아닐 수 없었을 것이다. 그러면 어떻게 방대한 부처님 가르침을 체계적으로 모아서 전승시킬 것인가? 그것은 기존의 인도 종교의 전통에서 찾을 수밖에 없었을 것이다.
우리가 잘 알고 있듯이 불교가 생기기 이전에 이미 인도의 여러 바라문 가문들은 각 가문이 속하는 문파에 따라서 베다 본집(本集, Saṁhita)과 제의서(祭儀書, Brāhmaṇa)와 삼림서(森林書, Āraṇyaka)와 비의서(秘義書, Upaniṣad)를 모아서 노래의 형태로 전승해 오는 전통이 튼튼하게 뿌리내리고 있었다. 예를 들면 전체 10장(만달라, Maṇḍala)으로 구성되어 있는 『리그베다』 의 2장부터 7장까지는 『리그베다』파에 속하는 바라문 가문들에서 전승되어 오는 찬미가를 각각 가문별로 모은 것이다. 예를 들면 『디가 니까야』 제1권 「암밧타 경」(D3 §2.8)에서 언급되고 있는 유명한 바라문 가문들 가운데 웻사미따(Sk. Viśvāmitra)는 『리그베다』3장을 전승해온 가문의 이름이며, 와마데와(Sk. Vāmadeva)는 4장을, 바라드와자(Bharadvāja)는 6장을, 와셋타(Sk. Vasiṣṭha)는 7장을 전승해온 가문의 이름이다. 그리고 8장은 깐와와 앙기라스 두 가문의 전승을 모은 것이며, 9장은 제사에서 아주 중요한 소마(Soma) 즙에 관계된 찬미가들을 모은 것이다. 여기에다 1장과 10장은 일종의 잡장인데 가문과 관계없는 시대적으로 늦은 찬미가들을 모아서 구성한 만달라이다.
그리고 『리그베다』의 각 장은 모두 다시 주제별로 모아져 있는데 먼저 바라문들의 신인 아그니에 관계된 찬미가를 모으고, 다음은 인드라, 그다음은 다른 여러 신들의 순서로 모았다. 이처럼 이미 불교가 생기기 이전부터 바라문들은 체계적으로 그들의 찬미가를 모아서 노래로 전승하고 있었다.
그리고 이 방식은 자이나교에도 그대로 적용되어 자이나의 앙가(Aṅga, 앙굿따라(앙가+웃따라)의 앙가와 같은 단어임)들도 다양한 방법론으로 결집되어 전승되어 온다. 물론 정통 자이나교라고 자처하는 공의파(空衣派, Digambara)에서는 마하위라 혹은 나따뿟따의 가르침은 이미 자이나 교단 초기에 인도 중원에 큰 기근이 들어서 자이나 수행자들이 탁발을 쉽게 할 수 있는 남쪽으로 내려가는 와중에 모두 잃어버렸다고 주장한다. 그러나 내려가지 않고 흰 옷을 입고 덜 엄한 고행으로 교단 체제를 바꾼 백의파(白衣派, Śvetāmbara)에서는 지금까지 그들이 전승해 오고 있는 앙가(Aṅga)들을 정전으로 인정하고 있다. 물론 이런 앙가들을 모두 마하위라나 초기 자이나 교단 수행자들의 가르침이라 보기에는 무리가 따르지만 『아야랑가』(Āyaraṅga, Ācaraṅga Sūtra), 『수야가당가』(Sūyagaḍaṅga, Sūtrakṛtanga Sūtra), 불교의 『숫따니빠따』와 같은 성격을 가진『웃따라다야나수뜨라』(Uttarādhyayana Sutra) 등은 언어학적으로나 문헌학적으로도 아주 오래된 것이라고 여러 학자들이 공히 인정한다.
이런 자이나교의 성전인 앙가들 가운데서 세 번째인 『타낭가』 (Thā-ṇaṅga, Stānaṅga)와 네 번째인 『사마와양가』 (Samavāyaṅga)는 『앙굿따라 니까야』 와 같이 숫자별로 정리되어 있는데, 『타낭가』 는 하나부터 10까지, 『사마와양가』 는 하나부터 백만까지의 숫자와 관계된 가르침을 숫자별로 모은 것이다.
한편 인도의 고대 서사시인 『마하바라따』 (Mahābhārata)에도 숫자별로 정리를 하고 있는 부분이 있는데 예를 들면 「우도갸 권」 (Udyoga-parvan)의 「위두라니띠 와꺄」 (Viduraniitivākya)를 들 수 있다.5).
인도 종교계의 사정이 이러하였기 때문에 불교교단도 부처님 말씀을 체계적으로 정리하기 위해서 자연스럽게 이러한 방법론을 그대로 받아 들였으며 특히 사리뿟따 존자와 마하깟사빠 존자와 같은 바라문 가문 출신들에게는 자연스런 추세였을 것이다.
5. 『앙굿따라 니까야』의 구성
이처럼 『앙굿따라 니까야』 는 니빠따(nipāta, 모음)라 불리는 숫자별로 분류한 11개의 모음으로 구성되어 있다. 각 모음은 많은 경들을 포함하고 있는데 주석서에 의하면 모두 9557개의 경들을 포함하고 있다고 설명하고 있으며 니까야들 가운데 가장 많은 경들을 포함하고 있다. 모음별로 분류된 경들은 다시 50개씩의 경들로 묶어서 분류하고 있는데 이것을 '50개 경들의 묶음(Paṇṇāsaka)'이라 부르고 있다. 빤나사까는 문자그대로 '50개로 된 것'이라는 의미이다. 이러한 50개의 묶음은 『맛지마 니까야』와 『상윳따 니까야』 에도 나타나고 있다.
이처럼 한 묶음에 포함된 50개의 경들은 다시 5개의 '품(Vagga)'으로 분류가 되는데 하나의 품은 기본적으로 10개씩의 경들을 포함하고 있다. 이렇게 조직하여 전체 9557개의 경들을 일목요연하게 정리한 것이 『앙굿따라 니까야』 이다.
이러한 분류법은 물론 『맛지마 니까야』와『상윳따 니까야』에도 적용되는 공통적인 방법이다. 『맛지마 니까야』의 152개의 경들은 모두 50개씩 세 개의 묶음으로 분류가 되고 이러한 묶음에는 다시 각각 다섯 개의 품으로 분류가 되며 각 품은 10개씩의 경을 포함하고 있다.
『상윳따 니까야』에 포함된 7762개의 경들은 모두 56개 주제별로 함께 모아서(saṁyutta) 분류하였으며 각각의 상응들 가운데 많은 경을 포함한 상응은 다시 50개씩의 묶음과 품으로 분류하여 편집하였다. 『디가 니까야』에 포함된 경들은 34개뿐이라서 50개의 묶음은 존재하지 않으며 품별로 3개의 품으로 나누어서 각각을 계온품(13개의 경들이 포함됨), 대품(10개의 경들), 빠띠까 품(11개의 경들)이라 부르고 있다. 이처럼 모든 니까야에서 많은 경들을 배열하는 데는 이것이 기본 원칙이다.
그러면 같은 모음 안에서 경들의 순서를 정하는 정해진 원칙이 있는가? 원칙을 찾으려고 노력한 흔적은 많지만 모든 묶음들과 품들이 반드시 정해진 원칙에 의해서 결집된 것은 아닌 듯하다. 물론 각 모음 별로 나름대로의 원칙이 없는 것은 아니다. 예를 들면 본서 제2권의 「넷의 모음」에 포함된 271개의 경들은 먼저 다섯 개의 50개 경들의 묶음으로 나누었고 경들 가운데 게송을 포함하고 있는 경들 70개는 제일 앞에 배열하였다. 그리고 그 나머지 경들 가운데서 긴 경들은 「큰 50개 경들의 묶음」 으로 모아서 네 번째 묶음으로 편집했다. 본서 제1권의 「셋의 모음」에 포함된 163개의 경들도 먼저 세 개의 묶음으로 나누고 긴 경들 50개는 두 번째 묶음으로 편집하고 아주 짧은 경들은 세 번째 묶음으로 편집하여 각각 「큰 50개 경들의 묶음」과 「작은 50개 경들의 묶음」이라 칭하였다. 그리고 품들 가운데서도 공통된 경들을 모은 품들이 다수 발견된다. 예를 들면 본서의 「둘의 모음」의 두 번째 50개 경들의 묶음에 포함된 5개의 품들은 모두 각 품에 공통되는 것을 중심으로 모았다.
6. 『앙굿따라 니까야』의 경은 모두 몇 개인가?
『앙굿따라 니까야 주석서』(AA.i.3)와 『디가 니까야 주석서』 등에 의하면 『앙굿따라 니까야』 에는 모두 9557개의 경이 포함되어 있는 것으로 확정되어 있다. 육차결집본에 의하면 모두 7231개경으로 편집되어 있다. PTS본을 통해서는 정확하게 몇 개의 경이 있는지를 알기 힘들다. 우드워드의 영역본을 참조하고 히뉘버 교수의 제안을 받아들이고6) 육차결집본과 비교해서 도표로 나타내어 보면 다음 페이지의 도표와 같다.
그러면 PTS본과 육차결집본의 경의 개수가 왜 이렇게 차이가 나는가? 먼저 분명히 밝히고 싶은 것은 내용에는 하나도 다른 부분이 없다는 것이다. 두 판본뿐만 아니라 다른 스리랑카나 태국의 여러 공식 판본과 필사본까지도 단어의 철자법이 다른 부분은 적지 않게 있고 혹 문장이 생략된 부분이 나타나기도 하지만, 내용이 다른 경이 새로 첨가된다거나 특정한 경이 생략된다거나 하는 경우는 없는 것으로 보인다.
번호 | 모음 | PTS본 | 육차본 | PTS권별 | 본서권별 |
A1 | 하나의 모음 | 575 | 611 | 제1권 | 제1권 |
A2 | 둘의 모음 | 283 | 246 | 제1권 | 제1권 |
A3 | 셋의 모음 | 163 | 184 | 제1권 | 제1권 |
A4 | 넷의 모음 | 271 | 783 | 제2권 | 제2권 |
A5 | 다섯의 모음 | 365 | 1151 | 제3권 | 제3권 |
A6 | 여섯의 모음 | 156 | 649 | 제3권 | 제4권 |
A7 | 일곱의 모음 | 96 | 1132 | 제4권 | 제4권 |
A8 | 여덟의 모음 | 96 | 626 | 제4권 | 제5권 |
A9 | 아홉의 모음 | 95 | 432 | 제4권 | 제5권 |
A10 | 열의 모음 | 219 | 746 | 제5권 | 제6권 |
A11 | 열하나의 모음 | 25 | 671 | 제5권 | 제6권 |
합계 | 11개 모음 | 2344 | 7231 | 전5권 | 전6권 |
* 육차본은 육차결집본(인도 Vipassana Research Institute 간행)을 뜻함.
그런데도 불구하고 두 판본에 나타나는 경의 개수가 왜 이렇게 차이가 나는가? 그것은 후대에 경을 편집하는 편집자들 혹은 결집회의의 주재자들이 경을 어떻게 편집하여 개수를 정했는가 하는 차이이다. 그래서 판본에 따라서 어떤 경은 앞 경에 포함된 것으로 편집되어 나타나기도 하고 어떤 부분은 한 경에서 독립된 경으로 편집되기도 한 것이다. 예를 들면 본서 제1권 「아난다 경」(A3:32) §2의 주해와 「사대천왕 경」2(A3:37)의 주해를 참조하기 바란다. 이런 차이일 뿐이지 경의 내용이 첨가되거나 생략된 부분은 없다.
그런데 경의 숫자의 차이가 배 이상이 되는 모음이 아주 많다. 예를 들면 PTS본의 「넷의 모음」은 271개의 경들로 번호가 매겨져 있지만 육차결집본에는 783개의 경들로 번호가 매겨져 있다. 어떻게 해서 이렇게 큰 차이를 보일 수가 있을까? 먼저 살펴봐야 할 점은 제28장 「탐욕의 반복 품」 이전의 부분들에서 PTS는 270개의 경으로 편집을 하였고 육차결집본은 273개의 경으로 편집을 하여 큰 차이가 없다.
「넷의 모음」에 포함된 경들의 숫자가 배 이상 차이가 나는 것은 오직 한 부분, 즉 「넷의 모음」의 맨 마지막 부분인 제28장 「탐욕의 반복 품」(Rāga-peyyāla, A4:271)을 어떻게 편집했느냐 하는 것에서 비롯된다. PTS본은 이 28장 「탐욕의 반복 품」 을 모두 하나의 경으로 취급하여 편집하였다. 그러나 육차결집본은 이 부분에 무려 510개의 경 번호를 매겼다. 이렇게 해서 전체적으로 모두 783개의 경이 된 것이다.
좀 더 자세히 살펴보면 「탐욕의 반복 품」에 나타나는 기본 내용은 '탐욕 · 성냄 · 어리석음부터 허영과 방일까지의 17개의 불선법을, 최상의 지혜로 앎과 철저히 앎부터 방기함까지의 10가지 방법으로 해결하기 위해서는, 사념처와 사정근과 사여의족의 3가지를 닦아야 한다.'는 것이다. 이렇게 해서 육차결집본은 17(탐, 진, 치, 분노 등) × 10(최상의 지혜로 앎, 철저히 앎 등) × 3(사념처+사정근+사여의족) = 510 개의 경들이 「탐욕의 반복 품」에 포함되어 있는 것으로 편집하고 있다. 그러나 역자의 저본인 PTS본에는 하나의 경으로 묶었다. 이렇게 해서 무려 510개의 차이가 나는 것이다.
거듭 밝히지만, 이렇게 PTS본에서 하나의 경으로 편집된 것이 육차결집본에는 510개의 경의 번호를 매겨서 편집하였지만 그 내용은 한 부분도 차이가 없다. 편집자가 경 번호를 어떻게 매겼냐 하는 차이뿐이다.
그런데 이 「탐욕의 반복」은 「셋의 모음」부터 「열하나의 모음」까지 『앙굿따라 니까야』의 모든 모음의 마지막에 항상 나타나고 있다. 육차 결집본은 이것을 모두 그 문맥에 맞추어서 많은 경들의 번호를 매기고 있고 PTS본은 하나 혹은 몇 개의 경들로 취급하고 있다. 이런 차이 때문에 두 판본의 경의 개수는 세 배 이상이 차이가 나는 것이다.
그러면 육차결집본은 왜 이렇게 편집하였을까? 이것이 승가의 전통적인 태도이기 때문이다. 거듭 밝히지만 상좌부에서는 전통적으로 『앙굿따라 니까야』에는 모두 9557개의 경들이 있다고 간주한다. 육차결집본은 이러한 전통을 그대로 계승하고 있기 때문에 이렇게 경의 개수를 매기는 것이다. 이렇게 해서 육차결집본의 편집에 따르면 모두 7231개의 경이 존재하게 되는데 붓다고사 스님이 밝힌 9557보다 2326개가 부족하다. 그러나 육차결집본에 한 개의 경으로 편집되어 있는 「셋의 모음」의 마지막인 「탐욕의 반복」 을 육차결집본의 「넷의 모음」의 「탐욕의 반복」 과 같은 방법으로 17(탐, 진, 치, 분노 등) × 10(최상의 지혜로 앎, 철저히 앎 등) = 170개의 경들로 편집하고, 같은 방법으로 「다섯의 모음」 등도 이렇게 편집한다면 육차결집본의 경의 개수는 9557개에 상당히 근접하게 될 것이다. 그래서 육차결집본은 9557이라는 숫자에 근접하기 위해서 이러한 편집을 하였다고 여겨진다. 그러나 이러한 전통에 별 관심이 없는 서양학자들은 그들 기준으로 경을 편집하였다.
육차결집본은 1957년에 미안먀 양곤에서 마무리된 6차결집에서 공식으로 승인된 것이기 때문에 승가의 전통을 가장 잘 보존하고 있다고 생각된다. 그러나 초기불전연구원은 세계 학계에서 기본 판본으로 자리 매김한 PTS본을 저본으로 할 수 밖에 없었으며 두 판본의 편집 차이는 가급적 모두 주해에서 밝히려 하고 있다. 이하 본 해제에서도 별다른 언급이 없는 한 경의 번호나 경의 언급은 모두 PTS본에 근거한 것임을 밝힌다.
7. 『앙굿따라 니까야』 에 포함된 경들의 편집 방법
첫째, "이와 같이 나는 들었다.(evaṁ me sutaṁ)"를 생략해서 편집하고 있다.
불교 경전에 조금 익숙한 독자들은 『앙굿따라 니까야』에 나타나는 경들을 보고 의아해하게 될 것이다. 왜냐하면 A1, A2 등, 각 모음(nipāta)의 첫 번째 경을 제외한 모든 경들에서 "이와 같이 나는 들었다."는 정형구가 나타나지 않기 때문이다. 이 문장은 대승경들을 포함한 모든 불교 경전에서 경의 권위를 확보하기 위해서 반드시 나타나는 문장인데 『앙굿따라 니까야』에서는 대부분 생략되어 있다. 그 이유가 무엇인가? 다른 특별한 이유는 없다. 『앙굿따라 니까야』의 경들은 숫자가 너무 많고 특히 그 길이가 짧기 때문에 경을 편집한 옛 스승들이 이 문장을 모두 생략해서 편집했을 뿐이다.
둘째, 급고독원에서 설하신 경들도 설법처(說法處)가 생략되었다.
그리고 급고독원에서 설하신 모든 경들에 나타나는 두 번째 정형구인 "한때 세존께서는 사왓티에서 제따 숲의 급고독원에 머무셨다."는 부분도 나타나지 않는 경들이 대부분이다. 이것은 어떻게 이해해야 할 것인가? 『앙굿따라 니까야』 경들의 대부분은 사왓티에 있는 제따 숲의 급고독원에서 설하신 것이다. 그래서 각 모음의 제일 처음 경(A1:1:1; A2:1:1; A3:1; A4:1 등)만 모든 정형구를 다 갖추어 편집하고 나머지 경들에서는 이 부분도 모두 생략해서 편집하였다. 물론 급고독원에서 설하지 않은 경들이나 세존께서 설하시지 않은 경들은 그 설법처와 설법자와 청법자등을 분명하게 밝히고 있다. 예를 들면 본서 「족쇄 경」(A2:4:5)과 「살하경」(A3:66) 등이다.
그러므로 사왓티의 급고독원에서 세존께서 설하신 경들의 경우에는 "이와 같이 나는 들었다. 한때 세존께서는 사왓티에서 제따 숲의 급고독원에 머무셨다."는 기본 정형구를 생략하고 있으며 이와 다른 경들은 모두 설법처와 설법자와 청법자를 분명하게 밝히고 있다. 그러므로 이러한 정형구가 나타나지 않는 경들은 모두 사왓티의 급고독원에서 세존께서 설하신 것이다.
그리고 이러한 편집은 이미 오래된 필사본들에서부터 전승되어 오며 스리랑카, 미얀마, 태국, 그리고 PTS본까지 모든 판본에서 한결같다는 점을 알아야 한다. 초기불전연구원에서 이렇게 생략해서 번역한 것이 결코 아님을 밝힌다.
8. 경의 이름
전통적으로 빠알리 문헌에서는 품의 명칭과 경의 이름은 그 품이나 그 경의 맨 마지막에 "어떤 품이 끝났다."라거나 "어떤 경이 끝났다."는 방법으로 언급되고 있다. 특히 PTS본『앙굿따라 니까야』는 전부 이렇게 편집되어 있다. 이것은 어떤 글의 제목을 맨 처음에 드러내는 현대식 방법과는 완전히 반대이다. 그러나 우리는 이미 현대식 방법에 많이 익숙해 있기 때문에 초기불전연구원의 모든 번역서는 현대식 방법에 따라 품이나 경의 이름을 모두 먼저 밝히고 이를 번역해 내고 있다.
PTS본에 의하면 본서 제1권의 경우 품의 명칭은 각 품이 끝나는 곳에 나타나고 있으며 경의 이름은 제1권 맨 마지막에 「하나의 모음」과 「둘의 모음」과 「셋의 모음」의 경의 이름을 모두 모아놓았다.(이것을 uddāna라 하는데 역자는 '권말 목록'으로 옮겼다.) 이것을 토대로 역자는 각 경 의 맨 처음에 경의 이름을 넣었다.
그리고 권말 목록(uddāna)은 모두 게송으로 되어 있기 때문에 '경(sutta)'이라는 단어가 모두 나타나지 않는다. 그러다 보니 PTS의 영역본을 위시한 대부분의 서양 번역에는 제목에 대부분 경(sutta)이라는 단어가 나타나지 않는다. 그러나 권말 목록은 게송의 형식으로 경의 이름만을 나열하고 있기 때문에 경(sutta)이라는 표기를 하지 않았을 뿐 이것은 엄연한 경이다. 주석서들에도 별다른 예외가 없는 한 경(sutta)이라는 단어를 명기하고 있으며 DPPN에도 반드시 경으로 표기하고 있다.
그리고 육차결집본은 짧은 경들의 경우에도 극히 짧은 「하나의 모음」만 제외하고 「둘의 모음」부터는 예외 없이 모두 경(sutta)이라고 표기하고 있다. 초기불전연구원에서도 이를 살려서 「둘의 모음」부터는 경을 넣어서 "허물 경," "노력 경" 등으로 표기하고 있다. 경이란 부처님 말씀으로 공인되었다는 의미를 내포하고 있기 때문이다.
경이라는 단어를 넣어서 경의 이름을 적다보니 「나무껍질로 만든 옷 경」(A3:97)이라든지 「화장터 나무토막 경」(A4:95)이라든지 하는 어색한 경우가 종종 발견된다. 그러나 부처님 말씀으로 공인되었다는 의미의 경이라는 단어를 넣어야 하는 것이 부처님 제자 된 도리라 생각하여 「하나의 모음」 만 제외하고 나머지는 모두 경이라는 단어를 넣어서 표기하였다. 경은 부처님 말씀이요 부처님 말씀은 단순한 성인의 전기나 역사서가 아니기 때문이다. 부처님의 말씀으로 공인된 경은 도를 추구하고 해탈 · 열반을 실현하고자 하는 수행자들의 목숨과도 같은 것이고, 모든 인류의 영원한 지남이 되는 금구성언이기 때문이다.
9. 경의 번호
역자가 경의 번호를 매긴 원칙은 다음과 같다.
『앙굿따라 니까야』의 모든 경들은 A로 시작한다. A는 Aṅguttara Nikāya(앙굿따라 니까야)를 뜻한다. A1은 『앙굿따라 니까야』「하나의 모음」을 뜻하고, A2는 「둘의 모음」을, A3은 「셋의 모음」을, A4는 「넷의 모음」을 뜻하며, 같이하여 A11은 「열하나의 모음」을 뜻한다.
그리고 「하나의 모음」과 「둘의 모음」은 품의 번호를 중심으로 하여 경의 번호를 매겼다. 그러므로 A1:12:2는 『앙굿따라 니까야』「하나의 모음」의 제12품의 두 번째 경이라는 의미이며, A2:10:4는 『앙굿따라 니까야』「둘의 모음」의 제10품의 네 번째 경이라는 의미이다.
「셋의 모음」과 「넷의 모음」이하는 품을 표기하지 않고 경의 순서를 중시하여 경의 번호를 매겼다. 예를 들면 A3:74는 『앙굿따라 니까야』「셋의 모음」의 74번째 경이라는 의미이고, A4:100은 『앙굿따라 니까야』 「넷의 모음」 100번째 경이라는 의미이다.
이렇게 「하나의 모음」과 「둘의 모음」은 품을 중심으로 번호를 매기고, 「셋의 모음」과 「넷의 모음」이하 「열하나의 모음」까지는 경을 중심으로 번호를 매긴 것은 PTS본의 쪽 번호에 이렇게 나타나고 있기 때문이다. 육차결집본은 「하나의 모음」과 「둘의 모음」도 모두 경을 중심으로 하여 일련번호를 매기고 있지만 본 번역의 저본인 PTS본이 합리적이라 생각하여 이를 따랐다.
10. 번역에 임한 태도
이미 초기불전연구원에서 역출한 다른 책들의 서문 등에서 밝혔지만 역자를 위시한 초기불전연구원의 역경승들은 경을 옮김에 있어서 몇 가지 원칙을 중시하고 있다. 이미 『디가 니까야』 서문에서 밝혔지만 다시 간추리면 다음과 같다.
첫째, 주석서를 중시하였다.
경은 단순한 전기가 아니라 부처님의 말씀이다. 이것은 해탈 · 열반을 실현하는 체계를 고스란히 담고 있는 정전(正典)이다. 경에 대한 이해는 단순한 언어학적 소양만으로는 결코 성취되지 않는다. 경은 부처님의 직계제자들이 이해하고 받아들였던 그분들의 안목을 빌지 않고서는 결코 심도 깊게 이해될 수 없다. 그러면 어떻게 부처님 말씀을 이해해야 할 것인가? 경에 나타나는 특정한 술어와 특정한 구문과 특정한 배경과 특정한 문맥은 어떻게 이해해야 할 것인가?
이 문제를 철저하게 고민한 것이 바로 주석서 문헌(Aṭṭhakathā)이다.
그러므로 주석서는 삼장(Tipiṭaka)에 대한 가장 오래된 권위이다.
둘째, 『청정도론』을 중시하였다.
이미 『청정도론』 해제에서 밝혔듯이 『청정도론』은 그 성격상 4부 니까야 전체에 대한 주석서이다. 그러므로 4부 니까야 전체에 나타나는 중요한 술어와 개념은 거의 대부분 『청정도론』에 설명되어 있다. 그리고 이러한 중요한 술어들은 『청정도론』에서 설명되었기 때문에 각 니까야의 주석서들에서는 더 이상 설명하지 않고 " 『청정도론』에서 상세하게 설명하였다."라고만 할 뿐이다. 그런 만큼『청정도론』 없는 주석서는 생각할 수 없으며 『청정도론』을 이해하지 못하고서는 초기경의 체계를 제대로 이해할 수 없다.
혹자는 주석서나『청정도론』을 단순히 붓다고사(Buddhagosa)라는 뛰어난 주석가의 견해 정도로 치부하려 한다. 그러나 『청정도론』 서문에서 정리하였듯이 주석서나 『청정도론』은 결코 붓다고사 스님의 개인작품이 아니라 상좌부에서 전승되어 오던 정통견해를 정리해서 빠알리어로 옮긴 것이다. 붓다고사 스님은 각 주석서의 서시와 후기 등에서 이러한 사실을 누차 강조하고 있다.
셋째, 『아비담마 길라잡이』를 중시하였다.
『청정도론』은 다시 『아비담맛타 상가하』(『아비담마 길라잡이』)가 없이는 그 핵심이 되는 술어와 가르침을 파악하기가 결코 쉽지 않다. 이런 이유로 초기불전연구원에서는 먼저 『아비담마 길라잡이』를 상 · 하로 출간하였고 이를 토대로 『청정도론』을 세 권으로 출간한 것이다. 이미 많은 분들이 『아비담마 길라잡이』를 읽고 호평을 해주셨듯이 『아비담마 길라잡이』는 교학에 대한 정확한 이해가 결여된 한국 땅에서 부처님 가르침의 정확한 길라잡이가 되리라 확신한다.
그러므로 본서를 번역 출간하면서 『청정도론』과 『아비담마 길라잡이』를 토대로 하였으며 주해에서 『청정도론』과 『아비담마 길라잡이』의 해당 부분을 지적하여 참고하도록 하였다.
넷째, 술어를 한글화하였다
이미 『청정도론』해제와『아비담마 길라잡이』서문 및 『디가 니까야』 역자서문에서도 밝혔듯이 초기불전연구원에서는 모든 술어들을 가급적이면 한글로 풀어 적는다는 원칙을 세웠다. 그 원칙은 『앙굿따라 니까야』 의 번역에서도 철저하게 유지되고 있다.
물론 이렇게 하다보면 한문 용어에 익숙한 분들은 당황스럽고 짜증나기 마련일 것이다. 그래서 한문 불교 용어에 익숙한 분들을 위해서 많은 곳에서 눈의 알음알이[眼識], 무더기[蘊], 기능[根] 등으로 한문을 병기했다. 그리고 무리하게 한글식 표기만을 고집하지는 않았다. 오히려 지금 절집에서 통용되는 한자말들은 그대로 사용하려 노력하였다.
다섯째, 존칭에 대한 원칙을 정하였다
이미 『디가 니까야』 역자서문에서 밝혔듯이 존칭은 다음과 같은 원칙을 정하였다.
① 모든 사람들(신들 포함)이 부처님께 말씀을 드릴 때는 모두 경어체로 표기한다.
② 부처님이 아주 연장자임이 분명한 사람에게 말씀하실 때는 존칭어로 옮긴다.
③ 그 외 부처님의 말씀은 모두 평어체로 옮긴다.
④ 그 외 비구가 비구들에게, 비구가 재가자들에게, 재가자가 재가자들에게 등의 경우에는 상호 존칭어로 옮긴다.
⑤ 부처님과 유력한 신들이나 왕들과의 대화는 상호 경어체로 했다.
11. 맺는 말
빠알리 삼장의 한글완역을 표방하고 초기불전연구원이 개원한지 4년이 되었다. 초기불전연구원은 2002년 10월에 개원하면서 바로 『아비담맛타 상가하』를 『아비담마 길라잡이』(상 · 하)로 번역해 냈는데 지금까지 4판이 거의 매진될 정도로 꾸준히 독자들의 관심을 끌고 있다. 이를 바탕으로 2004년에는 초기불전을 이해하는 노둣돌인 『청정도론』을 전3권으로 번역하여 교계의 큰 호평을 받았다. 그리고 초기불교 수행의 지침서가 되는 「대념처경」과 그 주석서를 『네 가지 마음챙기는 공부』로 엮어 내었고 「출입식념경」과 「염신경」과 이에 관계되는 주석서 문헌들을 발췌하여 『들숨날숨에 마음챙기는 공부』를 출간하고 이 두 책은 개정판까지 내면서 수행에 관심있는 분들에게 사랑을 받고 있다.
그리고 올 초에는 마침내 빠알리 경장의 첫 번째 니까야인 『디가 니까야』(길게 설하신 경)를 전3권으로 역출해내면서 이제 본격적으로 빠알리 삼장의 역경작업에 매진하고 있다.
이러한 성과를 바탕으로 이제 『앙굿따라 니까야』의 제1권과 제2권을 역출해내게 되었다. 순서상 『디가 니까야』 다음에는 『맛지마 니까야』가 출간되어야 하겠으나 여러 관심 있는 분들의 부탁과 조언을 바탕으로 『앙굿따라 니꺄야』부터 먼저 간행하게 되었으며 『앙굿따라 니까야』는 그 분량이 많기 때문에 먼저 제1권과 제2권을 출간하고 나머지 책들은 연이어서 간행할 예정이다. 독자 여러분들의 많은 성원과 후원과 관심을 부탁드린다.
이제 『앙굿따라 니까야』 제1권과 제2권을 역출해낸다. 경의 출판에 정재를 희사해주시고 교정과 편집에 동참해주시고 여러 가지 잡다한 일들을 부처님 일이라는 거룩한 마음으로 기꺼이 감내해주신 모든 분들께 엎드려 절을 올리며 감사의 마음을 전한다. 그분들의 존함은 『앙굿따라 니까야』 마지막 권에서 일일이 밝히도록 하겠다.
책을 출판하면서 역경불사를 한다는 환희심보다는 금구의 말씀을 혹시 잘못 번역하지는 않았는지 두려운 마음이 더 크다. 만일 잘못된 부분이 있다면 그것은 모두 역자의 역량이 부족한 탓이다. 이상하거나 애매한 부분을 발견하신 독자들께서는 언제든지 연락 주시어 다음 번 출간에서 바로 잡을 수 있도록 도와주시기를 기원한다.
『앙굿따라 니까야』 제1권과 제2권을 삼보님 전에 봉헌하면서 역자 서문을 접는다.
이 세상에 부처님 가르침이 오래오래 머물기를!
<앙굿따라 니까야 제1권 해제(解題)>
1. 들어가는 말
『앙굿따라 니까야』는 부처님이 남기신 가르침 가운데서 그 주제의 법수가 분명한 말씀들을 숫자별로 모아서 결집한 것이다.『앙굿따라 니까야』는 이러한 주제를 하나부터(A1) 열하나까지(A11) 모두 11개의 모음(Nipāta)으로 분류하여 결집하였다.
『앙굿따라 니까야』제1권에는「하나의 모음」(Eka-nipāta, A1)과「둘의 모음」(Dukka-nipāta, A2)과「셋의 모음」(Tikka-nipāta, A3)의 세 가지 모음이 수록되어 있다.「하나의 모음」은 부처님 말씀 가운데 하나의 주제를 담고 있는 경들을 모은 것이며,「둘의 모음」은 두 개의 주제를 담고 있는 경들을,「셋의 모음」은 세 개의 주제를 담고 있는 경들을 모은 것으로, 각각 575개의 경들과 283개의 경들과 163개의 경들을 포함하고 있다.
「하나의 모음」과「둘의 모음」은 대부분『법집론』(Dhs)의 앞부분에 나타나는「둘의 논모」(Dukka-mātikā)들처럼 짧은 문장의 경들로 구성되어 있지만「셋의 모음」부터는 일반적인 경의 형식을 갖춘 경들이 주종을 이루고 있다.
「하나의 모음」에 포함된 575개의 경들은 단 하나의 주제를 설명 없이 나열하고 있는 경들이 대부분이기 때문에 그 길이가 극히 짧다. 그래서 독립된 경으로 간주하기가 힘들다. 그리고 이 가르침들을 모두 경이라는 이름을 붙이면 지면이 너무 많아지게 되므로 역자는 단순히 경의 번호만을 표기하고 있다.「둘의 모음」부터는 경의 이름과 경의 번호를 표기하여도 될 만큼 분명한 주제를 담고 있어서 경의 이름과 번호를 표기하여 옮겼다. 그러나「둘의 모음」 제15장「증득 품」과 제16장「분노 품」의 117개 경들은 짝이 되는 두 가지 법수만을 나열하고 있는 극히 짧은 것이라서 지면상 경의 이름을 명기하지 않았다.「셋의 모음」은 독립된 경으로 간주할 수 있을 만큼 내용과 길이를 갖춘 경들이 대부분이다.
2.「하나의 모음」
『앙굿따라 니까야』「하나의 모음」에는 모두 575개 경들이 포함되어 있다. 경이지만 서언 부분을 뺀 본문은 대부분 한 개나 몇 개의 간단한 문장으로 구성되어 있는 지극히 짧은 가르침이 거의 전부이다. 그렇다고 해서「하나의 모음」을 소홀히 여기면 곤란하다. 이들은 비록 짧지만 초기불교의 중요한 법수들을 일목요연하게 나열하고 있는 경들이기 때문이다. 이 경들을 모두 21개의 품(Vagga)으로 나누어서 각 품마다 기본적으로 대략 10개씩의 경들을 배당하고 있다. 각 품을 중심으로 그 특징과 내용을 간단하게 살펴보는 것으로「하나의 모음」에 대한 해제에 대신하고자 한다.
제1장「형상 등의 품」(A1:1:1~10)
본 품은 남자가 여자에게 어떻게 유혹되며 반대로 여자가 남자에게 어떻게 유혹되는가를 적나라하게 밝히고 있다. 본 품에서 부처님께서는 남녀가 각각에게 유혹되는 것은 다름 아니라 각각이 가진 형상, 소리, 향기, 맛, 감촉(색․성․향․미․촉)의 다섯 가지 대상임을 설하고 계신다. 유혹은 갑자기 이유 없이 생기는 것이 아니라 모두 감각기능-감각대상-알음알이(근․경․식)의 연기구조 속에서 일어나고 사라지는 것이라고 설하고 계신다.
제2장「장애의 극복 품」(A1:2:1~10)
본 품은 다섯 가지 장애[五蓋]가 어떻게 일어나는가를 밝히고(§§1~5), 다시 이 다섯 가지 장애를 어떻게 극복하는 가를 밝히는(§§6~10) 중요한 품이다.
제3장「다루기 힘듦 품」(A1:3:1~10)
제4장「제어되지 않음 품」(A1:4:1~10)
이 두 품의 20가지 경들은 마음을 쌍으로 살펴보고 있다. 주석서는 이것을 윤회하는 마음과 윤회를 벗어나는 마음의 쌍으로 다음과 같이 설명한다.
“여기 [본 품에 쌍으로 나타나는 경들]에서 첫 번째로 [경에서 언급되는] 마음은 윤회하는(vaṭṭa) 마음이고 두 번째로 [경에서 언급되는] 마음은 윤회를 벗어나는(vivaṭṭa) 마음이다.
여기서 먼저 윤회(vaṭṭa)와 윤회의 발판(vaṭṭa-pāda)과 윤회를 벗어남(vivaṭṭa)과 윤회를 벗어나는 발판(vivaṭṭapāda)을 구분해서 알아야 한다. 윤회란 삼계윤회(tebhūmaka-vaṭṭa)를 말한다. 윤회의 발판이란 윤회를 하게 하는 업(kamma)을 말한다. 윤회를 벗어남이란 9가지 출세간법을 말한다. 윤회를 벗어나는 발판이란 윤회에서 벗어나게 하는 업을 말한다. 그러나 [본 품에 나타나는] 이 경들에서는 오직 윤회와 윤회에서 벗어남만을 설하고 있다.”(AA.i.52)
제5장「바르게 놓이지 않음 품」(A1:5:1~10)
본 품도 마음을 여러 측면에서 고찰하고 있다. 특히 8번째 경은 마음의 찰나성을 드러내고 있으며 9번째 경은 “비구들이여, 이 마음은 빛난다. 그러나 그 마음은 객으로 온 오염원들에 의해 오염되었다.”라고 하여 마음의 청정함과 객진번뇌(客塵煩惱)를 설명하고 있다.
이 가르침은 대승불교에서『능가경』이나 대승『열반경』 등 여러 경과 논서들을 통해서 객진번뇌로 정착이 되었다. 특히『능가경』에서 “以如來藏是清淨相 客塵煩惱垢染不淨(여래장은 본래 청정한 것이지만 객으로 온 번뇌에 오염되어서 깨끗하지 못하다.)”이라고 하였듯이 특히 여래장 사상에 지대한 영향을 주었다. 흥미로운 것은 한역『아함부』경들에서는 이러한 가르침이 나타나지 않는다는 사실이다.
우리가 유념해야 할 것은 초기불교에서 오직 이 곳에만 나타나는 이런 본자청정 객진번뇌의 가르침을 두고 부처님께서는 본자청정하고 더군다나 ‘영원불멸한’ 마음을 설하신 것으로 확대해석하는 것은 참으로 곤란하다는 점이다.
초기경들 전반에서 예외 없이 마음은 항상 연기적 존재이고 대상 없이는 일어나지 않는다. 그래서 조건생․조건멸이고 찰나생․찰나멸인 마음에 대해 바로 앞의 8번째 경에서는 마음은 너무나 빨리 변하기 때문에 어떤 비유로도 설명할 수 없다고 강조하고 있다. 마음을 불변하는 그 무엇으로 상정해버리면 그것은 즉시에 외도의 자아이론과 같아지고 만다는 것을 명심해야 할 것이다.
제6장「손가락 튀기기 품」(A1:6:1~10)
제7장「열심히 정진함 등의 품」(A1:7:1~10)
제8장「선우 등의 품」(A1:8:1~10)
제9장「방일 등의 품」(A1:9:1~17)
제10장「비법 등의 품」(A1:10:1~42)
앞부분인 제3품부터 제5품까지의 경들에서는 30가지 측면에서 마음의 여러 가지 성질을 고찰해보았으며 이하 제6품부터 제10품까지의 경들의 대부분은 이러한 마음을 닦고 개발하는 것을 간략하게 설하고 있다. 그 방법으로 객진번뇌의 이해, 자애의 마음을 닦음 등을 들고 있으며 선법과 불선법을 일어나게 하는 것들을 여러 가지 들고 있다.(1:6:6~1:8:3) 그리고 제9품의 마지막까지 계속해서 유익한 심리현상들과 해로운 심리현상들에 관계된 여러 가지를 나열하고 있다.
제11장「비법 품」(A1:11:1~10)
제10품 33번 경부터 본 품까지는 법과 비법(非法), 율과 비율(非律)에 대해서 언급하고 있다.
제12장「범계가 아님 등의 품」(A1:12:1~20)
위 제11품의 율과 비율의 언급을 더 발전시켜서 여기서는 여러 가지 범계와 범계 아님에 대해서 살펴보고 있는데 율장의 중요한 전문술어들이 나타나고 있다.
제13장「한 사람 품」(A1:13:1~7)
부처님의 존귀성을 일곱 가지 측면에서 고찰하고 있는 품이다.
제14장「으뜸 품」(A1:14:1~80)
본 품은 부처님 제자들 가운데 각 분야에서 으뜸가는 분 80명을 들고 있다. 본 품은 다시 7개의 부분으로 구성되어 있다. 이 가운데 첫 번째부터 네 번째까지는 각 방면에서 으뜸인 비구 47분들을 모은 품이고, 다섯 번째는 비구니 13분을, 여섯 번째는 청신사 10분을, 일곱 번째는 청신녀 10분을 모은 것이다. 이렇게 해서 각 방면에서 으뜸가는 80분의 부처님 제자들이 거명되고 있다. 물론 중복되어 나타나는 경우도 있는데 예를 들면 아난다 존자는 4-1~4-5까지 다문 제일, 마음챙김 제일, 총명 제일, 활력 제일, 시자들 중 으뜸으로 다섯 번이 언급되고 있다.
주석서는 이 80분의 으뜸가는 분들의 설명에 무려 335쪽을 할애하여 상세하게 설명을 하고 있다. 역자는 이를 참조해서 간략하게 주를 달아서 독자들의 이해를 도왔다.
제15장「불가능 품」(A1:15:1~28)
불가능한 일과 가능한 일, 즉 있을 수 없는 경우와 있을 수 있는 경우를 모두 한 경 안에 쌍으로 설하여서 모두 28가지 불가능한 일과 가능한 일을 들고 있다.
제16장「한 가지 법 품」(A1:16:1~10)
10가지 계속해서 생각함의 명상주제를 들고 있다.
제17장「씨앗 품」(A1:17:1~10)
본 품과 다음 품의 네 번째 경까지는 삿된 견해와 바른 견해를 중심으로 10가지를 살펴보고 있다.
제18장「막칼리 품」(A1:18:1~17)
본 품의 다섯 번째 경부터 마지막까지는 법과 율이 잘 설해진 경우와 법과 율이 잘못 설해진 경우에 생기는 현상들을 살펴보고 있다.
제19장「잠부 섬 품」(A1:19:1~2)
본 품은 순차적으로 수많은 중생들 가운데 법과 율을 만나서 법의 맛과 해탈의 맛을 아는 중생들이 적음을 설하고 있다.
제20장「손가락 튀기기의 연속 품」(A1:20:1~182)
손가락 튀기는 순간만큼이라도 본 품에 있는 182가지 법을 닦는 자라야 그를 일러 비구라 한다는 아주 귀중한 말씀들이 나열되고 있다. 특히 37보리분법과 8가지 지배와 8가지 해탈과 10가지 계속해서 생각함과 여러 가지 인식과 네 가지 禪과 사무량심 등의 명상주제들이 언급되고 있는 중요한 품이다.
제21장「몸에 대한 마음챙김 품」(A1:21:1~70)
본 품에서는 몸에 대한 마음챙김의 공덕을 70가지 측면에서 살펴보고 있다.
이처럼「하나의 모음」에 포함된 575개의 경들은 초기불교의 중요한 법수들, 특히 수행과 관계된 중요한 가르침들을 총망라하고 있다. 역자는 가급적이면 상세한 주해를 달려고 노력하였다.
3.「둘의 모음」
「둘의 모음」에는 283개의 경이 포함되어 있다. 각 경들의 주제가 둘에 관한 것이기 때문에「둘의 모음」에 실려 있는 대부분의 경들도 대부분 그 길이가 짧은 것들이다.「둘의 모음」은 모두 3개의 ‘50개 경들의 묶음(paṇṇāsaka)’으로 편집되어 있다. 그러나 한 묶음에 50개의 경만 포함되어 있는 것이 아니라 각각 50개의 경, 66개의 경, 167개의 경이 포함되어 있다. 이렇게 하여 모두 세 개의 경들의 묶음과 17개의 품들로 구성되어 있다.
그럼 각 묶음 별로 간단하게「둘의 모음」의 전체 구성을 살펴보자.
⑴「첫 번째 50개 경들의 묶음」
「첫 번째 50개 경들의 묶음」은 다음과 같이 다섯 개 품들로 구성되어 있다.
제1장「형벌 품」(A2:1:1~10)
제2장「대중공사[諍事] 품」(A2:2:1~10)
제3장「어리석은 자 품」(A2:3:1~10)
제4장「평등한 마음 품」(A2:4:1~10)
제5장「회중 품」(A2:5:1~10)
한 품에 열 개씩의 경들이 포함되어 있어서 전체적으로는 50개의 경들이 포함되어 있다. 첫 번째 경들의 묶음에는「둘의 모음」 가운데 비교적 긴 경들이 포함되어 있다. 그러나 각 품에 들어있는 경들은 서로 관련성이나 통일성을 발견하기 힘들다.
⑵「두 번째 50개 경들의 묶음」
「두 번째 50개 경들의 묶음」은 다음과 같이 다섯 개의 품들로 구성되어 있으며 모두 66개의 짧은 경들이 포함되어 있다.
제6장「사람 품」(A2:6:1~12)
제7장「행복 품」(A2:7:1~13)
제8장「표상 품」(A2:8:1~10)
제9장「법 품」(A2:9:1~11)
제10장「어리석은 자 품」(A2:10:1~20)
두 번째 묶음은 대부분 주제별로 잘 정리되어 있다. 제6장「사람 품」에는 사람들에 관계된 경들을 모았으며 특히 제7장「행복 품」의 13개의 경들은 다양한 행복들을 쌍으로 모아서 정리하고 있다. 제8장「표상 품」에 포함된 10개의 경들은 선법과 불선법이 일어나는 것은 그 표상, 동기, 원인, 의도적 행위, 조건, 물질, 느낌, 인식, 알음알이, 형성된 것이 있기 때문이라고 그 이유를 밝히고 있다. 제9장「법 품」은 쌍으로 된 법을 포함하는 11개의 경들로 이루어져 있다. 제10장「어리석은 자 품」은 어리석은 자에 해당하는 경우와 현명한 자에 해당하는 경우를 번갈아가며 다루는 경들 20가지로 구성되어 있다.
이처럼「두 번째 50개 경들의 묶음」은 서로 관련된 경들을 각 품에서 주제별로 잘 묶어 놓았다.
⑶「세 번째 50개 경들의 묶음」
「세 번째 50개 경들의 묶음」은 다음과 같다.
제11장「희망 품」(A2:11:1~12)
제12장「발원 품」(A2:12:1~11)
제13장「보시 품」(A2:13:1~10)
제14장「환영(歡迎) 품」(A2:14:1~12)
제15장「증득 품」(A2:15:1~17)
제16장「분노 품」(A2:16:1~100)
제17장「율 등의 품」(A2:17:1~5)
이것은 7개의 품들로 구성되어 있으며 모두 167개의 짧은 경들이 포함되어 있다. 특히 제16장「분노 품」에는 100개의 경들이「하나의 모음」(A1)의 제20장「손가락 튀기기의 연속 품」(A1:20:1~182)에서처럼 반복해서 나열되고 있다.
이 가운데 제13장「보시 품」은 보시나 관대함과 같은 남에 대해서 가지는 호의적이고 좋은 법수들로 구성된 경들 10개를 모은 것이다. 그러나 전체적으로는 서로 유사하거나 서로 반대가 되는 법수들을 간략하게 나열하고 있는 아주 짧은 경들 167개로 구성되어 있어서 일종의 잡다한 경들의 묶음의 성격이 강하다.
4.「둘의 모음」에서 관심을 가져야 할 경들
「둘의 모음」에서 우리가 꼭 주목해야 할 경들을 몇 가지 살펴보도록 하자.
⑴「뜻을 알아내어야 함 경」1/2(A2:3:5~6)
세존께서는 45년 동안 여러 부류의 사람들에게 아주 다양하게 많은 가르침을 주셨다. 우리는 그것을 대기설법(對機說法, pariyāya-desana)이라 부른다. 듣는 사람의 처한 상황이나 문제의식이나 이해 정도나 수행 정도나 기질이나 성향에 따라서 다양한 방법을 동원해서 설법을 하셨다는 말이다. 그러다보니 자기 깜냥만큼 부처님 말씀을 이해하여 세존의 근본 가르침과는 다르게 의미를 해석하는 경우가 발생하게 되었다. 그런 자들을 두고 세존께서는 본경을 말씀하신 것이다. 세존께서는 본경에서 다음과 같이 말씀하신다.
“비구들이여, 두 부류의 사람은 여래를 사실과 다르게 이야기 한다. 어떤 것이 둘인가?
[숨은] 뜻을 알아내어야 할 가르침에 대해서 이미 [그 뜻이] 확정된 가르침이라고 하는 자와 [이미 그 뜻이] 확정된 가르침에 대해서 [숨은] 뜻을 알아내어야 할 가르침이라고 말하는 자이다. 비구들이여, 이러한 두 부류의 사람은 여래를 사실과 다르게 이야기 한다.”
숨은 뜻을 알아내어야 할 가르침에 대해서 이미 그 뜻이 확정된 가르침이라고 하는 자에 대해서 주석서는 이렇게 설명하고 있다.
“예를 들면 ‘비구들이여, 한 사람, 두 사람, 세 사람, 네 사람이 있다.’라는 가르침은 그 ‘[숨은 뜻을] 알아내어야 하는 가르침(neyyattha suttanta)’이다. 왜냐하면 비록 정등각께서 ‘한 사람이 있다.’라는 식으로 말씀을 하셨더라도 ‘궁극적 의미에서는 사람(puggala)이라는 [개념은] 존재하지 않는다.’고 그 숨은 뜻을 알아내어야 하기 때문이다. 그러나 어리석은 자는 이런 가르침을 두고 ‘이미 그 뜻이 확정된 가르침(nītattha suttanta)’이라고 우긴다. ‘만약 궁극적 의미에서 사람이라는 것이 존재하지 않는다면 세존께서 ‘비구들이여, 한 사람이 있다.’라는 식으로 설하지 않으셨을 것이다. 그러나 이미 세존께서 그렇게 설하셨기 때문에 궁극적 의미에서 사람이라는 것이 존재한다.’고 잘못 이해하면서 숨은 뜻을 알아내어야 할 가르침에 대해서 이미 그 뜻이 확정된 가르침이라고 우긴다.”(AA.ii.118)
그리고 이미 그 뜻이 확정된 가르침에 대해서 숨은 뜻을 알아내어야 할 가르침이라고 말하는 자에 대해서 주석서는 이렇게 설명하고 있다.
“예를 들면 ‘무상이요 괴로움이요 무아다.’라는 말씀이 있다. 여기서 오직 무상이요 오직 괴로움이요 오직 무아라는 것이 그 뜻이다. 그러나 자신의 어리석음 때문에 ‘이것은 [숨은 뜻을] 알아내어야 할 가르침이다. 나는 그 뜻을 밝힐 것이다.’라고 하면서 ‘참으로 항상한 것이 있다. 참으로 행복이 있다. 참으로 자아가 있다.’라고 거머쥐면서 [이미 그 뜻이] 확정된 가르침에 대해서 [숨은 뜻을] 알아내어야 할 가르침이라고 우기는 것이다.”(Ibid)
우리 주위에도 잘못된 견해를 가진 이런 사람을 종종 만난다. ‘부처님은 브라흐마가 된다고 말씀하셨다. 그러므로 부처님은 범아일여를 말씀하셨다. 그리고 부처님은 초기경 도처에서 참된 사람(참사람, 眞人)을 말씀하셨다. 그러므로 자아나 개아는 실재한다. 그리고 부처님은 본자청정 객진번뇌를 말씀하셨다. 그러므로 마음은 영원하다.’라고. 이런 사람은 특히 이 말씀을 잘 음미해볼 필요가 있으리라.
⑵「영지(靈知)의 일부 경」(A2:3:10)
초기경의 여러 곳에서 사마타와 위빳사나라는 술어가 나타난다. 그러나 무엇이 사마타고 무엇이 위빳사나인지를 설명하신 경은 드물다. 그런 의미에서 사마타와 위빳사나를 정의하고 있는 본경은 아주 중요하다. 본경에서 세존께서는 말씀하신다.
“비구들이여, 사마타를 닦으면 어떤 이로움을 경험하는가? 마음이 개발된다. 마음이 개발되면 어떤 이로움을 경험하는가? 욕망(rāga)이 제거된다.
비구들이여, 위빳사나를 닦으면 어떤 이로움을 경험하는가? 통찰지가 개발된다. 통찰지가 개발되면 어떤 이로움을 경험하는가? 무명이 제거된다.
탐욕에 오염된 마음은 해탈하지 못하고 무명에 오염된 통찰지는 개발되지 못한다. 비구들이여, 탐욕이 제거되어 마음의 해탈[心解脫]이 있고, 무명이 제거되어 통찰지를 통한 해탈[慧解脫]이 있다.”
이처럼 본경에서 부처님께서는 분명히 사마타를 마음과 마음의 해탈(심해탈) 즉 삼매[定, 사마디]와 연결 지으시고 위빳사나를 통찰지와 통찰지를 통한 해탈(혜해탈) 즉 통찰지[慧, 빤냐]와 연결 지으신다. 그리고 삼매는 욕망을 극복하는 수행이고 통찰지는 무명을 극복하는 수행이라고 밝히신다.
그리고 본서 제2권의「삼매 경」1/2/3(A4:92~94)도 사마타 수행과 위빳사나 수행에 대한 귀중한 말씀을 하신다. 본서 제2권의 해제 §5의 ⑹과 ⑺을 참조할 것.
⑶「무슨 교설 경」(A2:4:3)
어떤 바라문이 세존께 와서 “고따마 존자시여, 당신은 어떤 교설을 가졌으며 무엇을 말씀하십니까?”라고 질문을 드리자 세존께서는 이렇게 대답하신다.
“바라문이여, 나는 지음에 대한 교설과 짓지 않음에 대한 교설을 가르친다.”
여기서 ‘지음에 대한 교설’과 ‘짓지 않음에 대한 교설’로 옮긴 원어는 각각 kiriya-vāda와 akiriya-vāda이다. 이 두 술어는 일반적으로 각각 업지음에 대한 교설과 업을 짓지 않음에 대한 교설로 옮겨진다. 전자는 도덕적 행위를 긍정하는 도덕긍정론이고 후자는 도덕적 행위를 부정하는 도덕부정론이다. 도덕부정론자로는 뿌라나 깟사빠와 막칼리 고살라 등이 잘 알려져 있다. 그래서 본서「하나의 모음」「막칼리 품」(A1:18)의 네 번째 경에서 세존께서는 막칼리 고살라를 엄하게 나무라신다. 그러나 본경을 잘못 이해하면 부처님께서는 도덕긍정도 가르치시고 도덕의 부정도 가르치시는 것처럼 잘못 이해할 수가 있다.
그러나 본경에서는 이런 양 극단에 해당하는 두 술어를 사용하여 부처님 교설의 특징을 분명하게 드러내 보이고 있다. 그래서 본경에서는 이 두 술어를 도덕긍정론과 도덕부정론의 의미로 옮기지 않고 문자적인 의미를 존중하여 각각 ‘지음에 대한 교설’과 ‘짓지 않음에 대한 교설’로 옮겼다. 본경에서 세존께서는 말씀하신다.
“바라문이여, 나는 짓지 않음에 대한 교설을 가르친다. 몸으로 나쁜 행위를 저지르고 말로 나쁜 행위를 저지르고 마음으로 나쁜 행위를 저지르는 자에게 여러 가지 나쁜 불선법들을 짓지 말 것을 가르친다.
바라문이여, 나는 지음에 대한 교설을 가르친다. 몸으로 좋은 행위를 하고 말로 좋은 행위를 하고 마음으로 좋은 행위를 하는 자에게 여러 가지 선법들을 지을 것을 가르친다.
바라문이여, 나는 이와 같이 지음에 대한 교설과 짓지 않음에 대한 교설을 가르친다.”
⑷「족쇄 경」(A2:4:5)
본경은 사리뿟따 존자가 안의 족쇄에 채인 자와 밖의 족쇄에 채인 자를 멋지게 설명하고 있는 경이다. 본경에서 존자는 금생에 계를 잘 지니고 수행하지만 죽어서 다시 인간으로 태어나는 자를 안의 족쇄에 채인 자라 설명하고, 금생에 계를 잘 지니고 수행하지만 죽어서 여러 천상의 신으로 태어나는 자를 밖의 족쇄에 채인 자라고 설명하고 있다. 아무리 수승한 경지의 신들일지라도 그들은 모두 족쇄에 채인 자들일 뿐이라는 사리뿟따 존자의 사자후이다.
존자의 이러한 대사자후를 들은 신들이 환희심이 생겨서 세존께 가서 그 사실을 말씀드리고 세존께서는 그곳으로 가셔서 “사리뿟따여, 외도들은 이 교법을 듣지 못하여 파멸한다.”고 하시면서 그의 설법을 크게 인정하고 계시는 경이다.
5.「셋의 모음」
「셋의 모음」에는 모두 163개의 경들이 포함되어 있다.「셋의 모음」에는 우리에게 잘 알려진 경들도 포함되어 있고 그 길이가 장부에 넣어도 될 만큼 긴 경도 포함되어 있다.
그래서 PTS본에서도「셋의 모음」부터 경의 번호를 I.x.8이나 II.v.4 등으로 품의 번호에 따라서 매기지 않고 처음부터 끝까지 III.1부터 III.163까지 일련번호로 매기고 있다. 이러한 방법은「셋의 모음」부터「열하나의 모음」까지 나머지 모음 전체에 다 적용시키고 있다. 그래서 역자도「셋의 모음」부터는 경의 번호를 A3:1부터 A3:163까지로 매기고 있다.
그럼 각 묶음 별로 간단하게「셋의 모음」의 전체 구성을 살펴보자.
⑴「첫 번째 50개 경들의 묶음」
「첫 번째 50개 경들의 묶음」은 제1장「어리석은 자 품」, 제2장「마차공 품」, 제3장「사람 품」, 제4장「저승사자 품」, 제5장「소품」까지 모두 다섯 품으로 구성되어 있으며 각 품에 10개씩의 경들이 포함되어 모두 50개의 경들이 수록되어 있다.「둘의 모음」에 비하면 상당히 긴 경들이고 각 주제에 대해서 심도 깊은 논의를 하고 있는 경들이 많다.
⑵「큰 50개 경들의 묶음」
「큰 50개 경들의 묶음」이라는 제목이 보여주듯이「셋의 모음」 가운데 가장 긴 경들로 구성되어 있다. 본 묶음에는 제6장「바라문 품」, 제7장「대품」, 제8장「아난다 품」, 제9장「사문 품」, 제10장「소금 덩이 품」까지 모두 다섯 품으로 구성되어 있으며 각 품에 10개씩의 경들이 포함되어 모두 50개의 경들이 수록되어 있다.
여기에 나타나는 경들은 대부분이『맛지마 니까야』에 포함되어 있는 경들 정도의 길이가 되는 것들로 이루어져 있고 이 가운데서도 다시 제7장「대품」의 경들의 길이는 더욱 길다. 그 가운데서도「팔관재계경」(A3:70)은『디가 니까야』의 웬만한 경들에 필적하는 길이이다.
본 묶음에 포함되어 있는 경들은 그 길이가 긴만큼 각 주제에 대해서 자세하고 심도 깊은 설법을 포함하고 있는 경들이 대부분이다. 그 가운데서도「웨나가뿌라 경」(A3:63)과「깔라마 경」(A3:65)과「팔관재계 경」(A3:70) 등은 주목할 만하다. 그리고 제8장「아난다 품」에 포함되어 있는 여러 경들은 아난다 존자와 여러 사람들의 대화를 기록한 경들이라서 관심이 가는 부분이다. 특히 아난다 존자가 세존께 여쭙고 세존이 대답하신「아비부 경」(A3:80)에는 소천세계, 중천세계, 삼천대천세계의 설명이 상세하게 나타난다. 그리고「소금 덩이 경」(A4:99)도 업에 대한 과보가 왜 다르고 다양한지를 이해할 수 있는 좋은 경이다.「불순물 제거하는 자 경」(A3:100)도 주목할 만하다. 자세한 것은 아래의 관심을 가져야 할 경들 부분을 참조하기 바란다.
⑶「작은 50개 경들의 묶음」
본 묶음에는 제11장「바른 깨달음 품」, 제12장「악처로 향하는 자 품」, 제13장「꾸시나라 품」, 제14장「무사 품」, 제15장「길상 품」, 제16장「나체수행자 품」까지 모두 6개의 품이 포함되어 있다. 제15장까지는 각 품에 10개의 경들이 포함되어 있고 제16장에는 13개의 경들이 포함되어서 모두 63개의 경들이 여기에 포함되어 있다.「첫 번째 50개 경들의 묶음」에 포함된 경들 정도의 길이로 된 경들이 대부분이다.
전체적으로 볼 때「셋의 모음」에 포함된 경들 가운데 긴 경들을「큰 50개 경들의 묶음」으로 모아서 편집하였으며 그 가운데서도 더 긴 것들은「대품」으로 모았다. 그리고 법수만 나열하고 있는 짧은 경들을 본「작은 50개 경들의 묶음」으로 모았다.
6.「셋의 모음」에 나타나는 주제들
「셋의 모음」에는 다양한 주제들이 포함되어 있지만 그 가운데서도 특히 많이 나타나고 있는 주제들을 살펴볼 필요가 있다.
먼저 업(業, kamma) 특히 신․구․의 삼업에 관계된 경들을 들 수 있다.「셋의 모음」에 포함되어 있는 163개 경들 가운데 34개 정도의 많은 경들이 업을 주제로 하고 있다. 그것도 대부분 몸과 말과 마음[身․口․意]으로 짓는 삼업(三業)을 기본 주제로 삼고 있다. 인간은 몸을 문으로 하고 말을 문으로 하고 마음을 문으로 하여 다양한 업을 짓고 이러한 업의 과보에 계박되어서 선처와 악처로 생사윤회를 거듭한다.「셋의 모음」에는 이러한 삼업에 관련된 가르침이 가장 많이 모아져 있다.
그리고 셋에 관한 부처님의 가르침 가운데는 우리에게 삼독(三毒)으로 잘 알려진 탐욕․성냄․어리석음[貪․瞋․癡]에 관한 것이 많다. 그래서「셋의 모음」에서도「원인 경」(A3:33)과「왓지의 후예 경」(A3:83) 등 대략 17개 정도의 경들은 탐욕, 성냄, 어리석음의 세 가지를 주제로 하고 있다.
셋에 관한 부처님 말씀 가운데는 계와 삼매와 통찰지[戒․定․慧]의 삼학(三學)이 들어있다. 계․정․혜 삼학은『디가 니까야 』제1권의 13개의 경들 가운데 10개 정도 긴 경들의 주제이기도 하다. 본서의「셋의 모음」에서도 이러한 삼학을 주제로 하고 있는 경이 대략 10개 정도 나타나고 있다.
「셋의 모음」에는 사람들을 세 가지 부류로 나누어서 설명하는 경들이 다수 나타난다. 제3장「사람 품」의 10개의 경들을 포함한 14개 정도의 경들은 세 부류의 사람을 여러 측면에서 분류하고 있다. 그리고 제1장「어리석은 자 품」에 포함된「특징 경」(A3:2)부터「나쁜 행위 경」(A3:9)까지 8개의 경들은 어리석은 자와 현명한 자의 특질을 각각 세 가지씩을 들면서 비교해서 설명하고 있는데 이러한 경들도 결국은 사람을 설하시는 경으로 분류할 수 있겠다.
부처님은 인간을 길들이는 분(조어장부)이라 불리는 분이다. 인간을 분류하고 있는 이러한 경들은 조어장부로서의 세존의 진면목을 유감없이 드러내고 있다. 여기에 대해서는 본서 제2권 해제 §4 등을 참조하기 바란다.
그러나 셋에 관계된 중요한 가르침인 무상․고․무아의 삼특상(ti- lakkhaṇa)을 주제로 한 경들은「셋의 모음」에서는 찾아보기 힘들다. 이 삼특상은 유위법의 보편적인 성질[共相, sāmañña-lakkhaṇa]인데『상윳따 니까야』의「온 상응」(Khandha-saṁyutta, S22)이나「육처 상응」(Saḷāyatana-saṁyutta, S35) 등에서 무더기․감각장소․요소[蘊․處․界]의 보편적 성질로 아주 많이 나타나고 있기 때문에 본서의「셋의 모음」에서는 무상․고․무아를 기본주제로 한 경들로 묶어내지는 않은 것으로 보인다.
그리고 셋에 관계된 중요한 법수인 불․법․승 삼보를 주제로 한 경들도 나타나지 않는데 이것은 다른 니까야의 경우도 마찬가지이다.
7.「셋의 모음」에서 관심을 가져야 할 경들
우선「셋의 모음」 제7장「대품」의 경들을 주목해야 할 필요가 있을 것 같다.「대품」이라는 명칭이 보여주듯이「셋의 모음」 가운데서 가장 긴 경들이 여기에 포함되어 있으며 긴만큼 심도 깊은 논의가 진행되기 때문이다.
⑴「깔라마 경」(A3:65)
세상에는 서로 다른 여러 종교가 있고 서로 다른 여러 철학이 있고 서로 다른 여러 계율 규범이나 생활 규범이 있고 또 서로 다른 여러 관습이 있다. 세상에 태어나서 하나의 종교나 철학이나 규범이나 관습만을 평생 접하고 산다면 어쩌면 인간에게 큰 혼란이 없을 수도 있을 것이다.(물론 더 큰 미망에 빠져 지낼 가능성도 배제할 수는 없지만 말이다.) 그러나 인터넷이나 미디어나 고도로 발달된 교통수단과 통신수단의 영향 하에 살아가야 하는 현대인들은 다양한 종교, 다양한 철학, 다양한 규범, 다양한 관습을 접할 수밖에 없다. 그러면 이러한 다양한 체계를 접하여 그것을 받아들이고 거부하는 가장 중요한 척도는 무엇일까? 무엇에 근거해서 어떤 체계는 받아들여야 하고 무엇에 바탕해서 어떤 체계는 거부해야 하는 것일까?
이것을 설명하고 있는 것이 바로「깔라마 경」이다. 이런 의미에서「셋의 모음」에서 가장 잘 알려진 경은 뭐라 해도「깔라마 경」일 것이다. 다양한 종교인들이 서로 극단적으로 다른 가르침을 설하자 그것을 접하여 혼란스러웠던 께사뿟따의 깔라마 인들은 세존께서 그들의 마을에 도착하시자 바로 이러한 문제를 단도직입적으로 제기하고 있다.
여기에 대해서 세존께서는 이렇게 분명하게 말씀하신다.
“소문으로 들었다 해서, 대대로 전승되어 온다고 해서, ‘그렇다 하더라.’고 해서, [우리의] 성전에 써 있다고 해서, 논리적이라고 해서, 추론에 의해서, 이유가 적절하다고 해서, 우리가 사색하여 얻은 견해와 일치한다고 해서, 유력한 사람이 한 말이라 해서, 혹은 ‘이 사문은 우리의 스승이시다.’라는 생각 때문에 그대로 따르지는 말라. 깔라마들이여, 그대들은 참으로 스스로가 ‘이러한 법들은 해로운 것이고, 이러한 법들은 비난받아 마땅하고, 이런 법들은 지자들의 비난을 받을 것이고, 이러한 법들을 많이 받들어 행하면 손해와 괴로움이 있게 된다.’라고 알게 되면 그때 그것들을 버리도록 하라.”
이렇게 말씀하신 뒤에 하나하나 문답을 통해서 어떤 가르침이 나의 탐욕과 성냄과 어리석음을 증장시키는가 감소시키는가를 가지고 그 가르침을 판단하라고 말씀하신다. 어떤 가르침을 듣고 그대로 행해서 나의 탐욕이나 성냄이나 어리석음이 증장한다면 그 가르침은 따르지 말라고 하시고 반대로 해소가 된다면 그런 가르침은 따르라는 말씀이시다.
그리고 마지막으로 세존께서는 이렇게 실천하는 사람에게는 네 가지 위안이 있다고 말씀하신다. 세존의 말씀을 인용해본다.
“만약 다음 세상이 있고, 선행과 악행의 업들에 대한 결실과 과보가 있다면 나는 몸이 무너져 죽은 뒤 좋은 곳[善處], 천상세계에 태어날 것이다.
만약 다음 세상도 없고 선행과 악행의 업들에 대한 결실과 과보도 없다면 나는 금생에 원한 없고 악의 없고 고통 없이 행복하게 살 것이다.
만약 어떤 이가 행하면서 나쁜 행을 하더라도 내가 다른 이에게 악을 저지르도록 교사하지 않았고 내 스스로도 악업을 짓지 않았거늘 어떻게 내가 고통과 마주치겠는가?
만약 어떤 이가 행하면서 나쁜 행을 하지 않으면 나는 양면으로 청정한 나를 볼 것이다.”
네 번째 위안에 대해서 주석서는 이렇게 설명한다. “양면으로 청정하다는 것은 내가 악을 저지르지 않고 또 어떤 이가 행하면서 악을 행하지 않기 때문에 양면으로 청정하다.”(AA.ii.306)
한편 이러한 세존의 가르침은 본서 제2권「밧디야 경」(A4:193)에도 나타나는데 세존의 이러한 말씀을 들은 밧디야는 이것이야말로 최고의 ‘개종시키는 요술’이라고 경탄해마지 않는다.
⑵「몸으로 체험한 자 경」(A3:21)
해탈은 어떻게 이루어지는가? 해탈을 성취하기 위한 가장 중요한 바탕은 무엇인가? 왜 다 같이 해탈한 사람인데 그 경지는 다른 듯이 보이고 성향도 다른 듯이 보이는가? 그 이유는 무엇인가?
여기에 대한 답이 본경에 들어있다. 본경은 이런 문제를 두고 사윗타 존자와 마하꼿팃따 존자와 사리뿟따 존자의 대화로 구성되어 있다. 본경에서는 해탈한 사람 가운데 세 부류인 몸으로 체험한 자, 견해를 얻은 자, 신심으로 해탈한 자를 든 뒤에 첫 번째는 삼매와, 두 번째는 통찰지와, 세 번째는 믿음(초기경에서 믿음은 항상 계와 연결이 되고 있다)과 연결 지으신다.
이처럼 본경은 수행에 있어서 믿음과 삼매와 통찰지 즉 계․정․혜의 역할을 잘 보여주고 있으며 사윗타 존자와 마하꼿팃따 존자와 사리뿟따 존자는 각각 신심으로 해탈한 분, 몸으로 체험하여 해탈한 분, 견해를 얻음을 통해서 해탈한 분이었음을 알 수 있으며 그래서 각각 믿음과 삼매와 통찰지의 기능이 강한 분들이었음을 알 수 있다.
본경이 중요한 이유는 개인의 기질이나 성향에 따라서 믿음이 더 강하기도 하고, 삼매나 선정이 더 강하기도 하고, 통찰지나 위빳사나가 더 강하기도 하다는 것을 보여주기 때문이다. 그런 것이지 모든 사람들에게 천편일률적으로 적용되는 가르침이란 이론적으로는 가능할지 모르나 현실적으로는 존재하지 않는다. 그래서 세존께서도 본경에서 “이러한 세 부류의 사람들 가운데 누가 가장 훌륭하고 고결한지를 결정적으로 말하는 것은 쉬운 일이 아니다.”라고 말씀하신다. 그러나 어떤 경우에도 사성제를 통찰하지 못하면 그것은 깨달음이라 할 수 없다.
⑶「거꾸로 놓은 항아리 경」(A3:30)
본경은 통찰지를 토대로 하여 불자들을 “통찰지가 거꾸로 놓인 항아리와 같은 사람, 통찰지가 허리에 달린 주머니와 같은 사람, 통찰지가 큰 사람”의 셋으로 분류하고 있다.
첫 번째 유형의 불자는 지속적으로 절에 가지만 법을 들을 때도, 듣고 집으로 돌아왔을 때도 그 가르침을 전혀 음미하지 않고 이해하지 못하는 경우이다. 이는 거꾸로 놓인 항아리에 물을 붓는 것과 같은 것이다. 두 번째 유형의 불자는 절에 가서 법을 들을 때는 잘 이해하지만 집에 돌아가면 다 잊어버리고 실천하지 않는 자이다. 이런 불자는 허리에 달린 주머니에 맛있는 사탕 등을 잔뜩 넣었지만 일어나면서 주머니에 사탕이 든 줄을 잊어버려서 쏟아버리는 것과 같다. 세 번째 유형의 불자는 들을 때도 잘 이해하고 집에 가서도 잘 실천하는 자이다. 이런 불자는 바로 놓인 항아리에 물을 붓는 것과 같이 통찰지가 큰 사람이다.
본경은 제자들로 하여금 자신은 이 셋 가운데 어떤 부류의 불자인지 스스로를 점검하도록 하는 가르침이다.
⑷「알라와까 경」(A3:34)
세존께서 알라위에서 고막가에 있는 심사빠 숲 속에 떨어진 나뭇잎 더미 위에 머무시는 것을 보고 핫타까 왕자가 세존께 “세존이시여, 안녕히 주무셨습니까?”라고 안부를 묻자 세존께서 핫타까에게 말씀하신 경이다.
세존께서는 탐욕으로 인한 육체적인 열기와 정신적인 열기가 생겨 그러한 탐욕에서 생긴 열기로 불탈 때 그는 잠을 제대로 이루지 못할 것이며 그렇다면 호화로운 저택과 잠자리도 행복을 가져다주지 못한다고 말씀하신다. 그러나 이러한 탐욕의 열기가 가라앉은 사람에게는 머무는 모든 곳이 훌륭한 집이요 좋은 잠자리라고 강조하신다. 수행자에게는 탐욕과 성냄과 어리석음을 해소하는 것이 중요하지 머무는 거처가 중요한 것은 아니라는 것을 일깨워주시는 가르침이다.
⑸「유행승 경」(A3:54)과「열반 경」(A3:55)
이 두 경들은 각각 법과 열반은 “스스로 보아 알 수 있고, 시간이 걸리지 않고, 와서 보라는 것이고, 향상으로 인도하고, 지자들이 각자 알아야 하는 것이다.”라는 부처님 말씀의 의미에 대한 설명을 담고 있는 가르침이다.
탐욕과 성냄과 어리석음에 빠진 사람은 자기와 타인을 해치는 생각을 하고 육체적 고통과 정신적 고통을 경험하며, 몸과 말과 마음으로 나쁜 행위를 저지르며, 자기와 타인에게 이로운 것을 있는 그대로 꿰뚫어 알지 못한다. 그러나 탐욕과 성냄과 어리석음에 빠지지 않은 사람은 이와는 반대이다.
이처럼 탐욕과 성냄과 어리석음이 다함은 스스로 보아 알 수 있고, 시간이 걸리지 않고, 와서 보라는 것이고, 향상으로 인도하고, 지자들이 각자 알아야 하는 것이라고 선언하시며 이것을「유행승 경」에서는 법으로 표현하고 있고「열반 경」에서는 열반으로 설명하고 있다. 참으로 부처님 법은 탐․진․치의 소멸을 근본으로 하며 이러한 탐․진․치가 소멸된 경지가 바로 열반이다.
⑹「외도의 주장 경」(A3:61)
본경에서 부처님께서는 외도의 주장을 다음과 같이 크게 셋으로 정리하고 계신다.
첫째는 ‘모든 것은 전생의 행위에 기인한다.’는 것이고, 둘째는 ‘모든 것은 신이 창조했기 때문이다.’는 것이고, 셋째는 ‘어떤 것에도 원인도 없고 조건도 없다.’는 것이다.
이것은 지금도 대부분의 인류가 가지고 있는 대표적인 세 종류의 믿음이다. 모든 것을 전생의 탓으로 돌리는 것은 일종의 운명론이며 힌두교가 대표적이다. 모든 것을 신의 피조물로 여기는 것도 일종의 운명론이며 기독교가 대표적이다. 원인도 조건도 없다는 것은 도덕부정론이며 유물론적인 사고방식이다.
부처님께서는 이러한 사고방식을 위험하다고 지적하신다. 왜? 이러한 사상에 물들게 되면 스스로의 향상을 위한 노력을 포기해버리기 때문이다. 그래서 방일하게 되고 모든 것을 운명이나 남의 탓으로 돌리게 되기 때문이다. 그래서 세존께서는 이렇게 정리하신다.
“[이러한 셋을] 진심으로 믿는 자들에게는 해야 할 것과 하지 말아야 할 것에 대해 [하려는] 열의와 노력과 [하지 않으려는] 열의와 노력이 없다. 해야 할 것과 하지 말아야 할 것에 대해 진실함과 확고함을 얻지 못하고 마음챙김을 놓아버리고 [여섯 가지 감각기능의 문을] 보호하지 않고 머물기 때문에 그들은 자기들 스스로 정당하게 사문이라고 주장하지 못한다.”
이렇게 말씀하신 뒤 세존께서는 여섯 가지 요소[界], 여섯 가지 감각접촉의 장소[處], 18가지 마음의 움직임, 네 가지 성스러운 진리[四聖諦]를 말씀하신 뒤 “내가 설한 이러한 법들은 현명한 사문․바라문들에게 논박될 수 없고 오염될 수 없고 비난받지 않고 책망듣지 않는다.”고 선언하신다. 그리고 이들을 연기법적인 고찰을 바탕으로 자세하게 설명하신다. 본경은 외도의 가르침에 대비되는 부처님 가르침의 특징을 잘 드러내는 경이다.
⑺「웨나가뿌라 경」(A3:63)
본경은 웨나가뿌라의 바라문 장자들이 세존께 와서 “고따마 존자께서는 여러 종류의 높고 넓은 침상들을 원하기만 하면 얻을 수 있고 어려움 없이 얻을 수 있고 많이 얻을 수 있지 않습니까?”라고 말씀드리자 세존께서 대답하시는 경이다.
그들의 물음에 대해서 세존께서는 세 종류의 넓고 높은 침상에 대해 말씀하신다. 즉 천상의 넓고 높은 침상과 범천의 넓고 높은 침상과 성자(ariya)의 넓고 높은 침상이다. “나는 지금 바로 그것을 원하기만 하면 얻을 수 있고 어려움 없이 얻을 수 있고 많이 얻을 수 있다.”고 대답하신다. 그런 뒤에 수행자에게 있어서 세 가지의 높고 넓은 침상이란 바로 네 가지 선[四禪], 네 가지 거룩한 마음가짐[四梵住], 탐․진․치의 멸절이라고 설명하고 계신다.
본경에는 수행자가 사용하고 머물러야 할 곳은 호화로운 침상이나 저택이 아니라 선정과 거룩한 마음가짐과 탐․진․치의 해소라는 세존의 가르침이 담겨있다.
⑻「팔관재계 경」(A3:70)
본경은「셋의 모음」 가운데서 가장 긴 경이다. 미가라마따(녹자모) 위사카가 포살일에 승원에 오자 세존께서 그녀에게 설하신 가르침인데 특히 재가신도가 지켜야 할 포살과 8계를 설명하고 있는 중요한 경이다.
본경에서 세존께서는 포살을 목동의 포살, 니간타의 포살, 성자의 포살로 상세하게 설명하신다. 포살을 준수하면서 내일은 맛있는 것을 먹어야지 하는 등의 생각에 빠져 있는 자는 마치 목동이 내일은 소들을 어디어디에서 방목하고 물을 먹여야지 하는 생각으로 밤을 지새는 것과 같으며 이것을 목동의 포살이라 한다.
니간타의 제자들은 포살일에 무소유를 선언하더라도 포살이 끝나면 다시 이전대로 모든 것을 소유하게 된다. 그러므로 포살일에만 무소유를 선언하는 것은 거짓말을 하는 것이며 이러한 것을 니간타의 포살이라 한다.
이렇게 설명하신 뒤에 성자들의 포살 즉 불자가 지키는 포살을 상세하게 설명하신다. 요약하자면 불자는 포살일에 불․법․승․계․천신을 계속해서 생각하면서 오염된 마음을 바른 방법으로 청정하게 한다. 그리고 포살일에는 재가자도 아라한의 삶의 기본이 되는 여덟 가지 계를 지키는 것으로 성자들의 포살을 설명하신다. 여덟 가지 계는 다음과 같다.
① 생명을 죽이지 않는다.
② 주지 않은 것을 가지지 않는다.
③ 성행위를 하지 않는다.
④ 거짓말을 하지 않는다.
⑤ 방일하는 근본이 되는 술과 중독성 물질을 섭취하지 않는다.
⑥ 하루 한 끼만 먹는다.
⑦ 춤, 노래, 음악, 연극을 관람하지 않고 화환을 두르고 향과 화장품을 바르고 장신구로 꾸미는 것을 하지 않는다.
⑧ 높고 큰 침상을 사용하지 않는다.
⑼「아비부 경」(A3:80)
아난다 존자가 세존께 여쭙고 세존이 대답하신「아비부 경」에는 소천세계, 중천세계, 삼천대천세계의 설명이 상세하게 나타나는데 이러한 가르침은 4부 니까야에서는 이곳에 밖에 나타나지 않는 가르침인 듯하다. 그리고 전체 초기경들 가운데서도『의석』(義釋, Niddesa)을 제외하고는 이곳 밖에 나타나지 않는 것으로 보인다. 그러므로 본경은 주석서나 부파불교와 특히 대승불교에서 전개하고 있는 우주관의 출발이 되는 경이라 할 수 있다.
하나의 세계는 각각 하나씩의 달과 태양과 산의 왕인 수미산과 잠부디빠와 아빠라고야나와 웃따라꾸루와 뿝바위데하와 큰 바다와 사대왕천과 삼십삼천과 야마천과 도솔천과 자재천과 타화자재천과 범천이 있다. 이러한 세계가 1000이 모인 것을 소천세계라 하고 이러한 소천세계가 1000이 모인 것을 중천세계라 하고 이러한 중천세계가 1000이 모인 것을 삼천대천세계라 한다. 즉 중천세계에는 모두 100만의 세계가 있고 삼천대천세계에는 모두 10억의 세계가 있는 셈이다.
⑽「마하나마 경」(A3:73)
본경은 삼매가 먼저냐 통찰지가 먼저냐를 묻고 있는 관심을 끄는 경이다.
삭까족 마하나마가 세존께 “세존이시여, 그러면 삼매가 먼저 있고 지혜가 뒤에 있습니까? 아니면 지혜가 먼저 있고 삼매가 뒤에 있습니까?”라고 묻고 세존이 병환에서 회복하신지 얼마 지나지 않았기 때문에 아난다 존자가 이에 대답하는 경이다.
마하나마가 삼매[定]가 먼저냐 통찰지[慧]가 먼저냐고 질문한데 대해서 아난다 존자는 이 둘의 선후를 대답하는 대신 유학의 삼매와 통찰지는 무학의 삼매와 통찰지보다 먼저인 것이 분명하지만 같은 유학 안에서나 같은 무학 안에서 정과 혜는 선후를 말할 수 없다고 대답하고 있다. 그래서 복주서는 “먼저 유학의 계․정․혜를 설하고 뒤에 무학의 계 등을 설하면서 이 뜻을 드러내는 것이다.”(AAṬ.ii.164)라고만 간략하게 설명하고 있다.
그리고 삼매가 먼저냐 통찰지가 먼저냐 혹은 사마타가 먼저냐 위빳사나가 먼저냐에 대한 답은 오히려 본서 제2권「삼매 경」1/2/3(A4:92~94)의 세 개의 경에 있다고 본다. 이 경들을 통해서 살펴보면 삼매가 먼저냐 통찰지가 먼저냐 하는 것은 수행자 개인의 기질이나 성향에 달린 것이지 무엇이 먼저라고는 말할 수 없다는 것이 분명하다. 여기에 대해서는 제2권 해제 §5의 ⑺과「삼매 경」1/2/3(A4:92~94)과「쌍 경」(A4:170)을 참조할 것.
⑾「사문 경」(A3:81)
출가란 말 그대로 집을 떠나는 행위이다. 집을 떠난다 함은 집으로 표현되는 세상의 모든 의무나 권리나 욕망이나 희망을 모두 접는다는 뜻이다. 그러면 이러한 세속의 모든 의무나 권리나 욕망이나 희망을 접고 출가를 한 자는 무엇을 해야 하는가? 본경은 이것을 분명하게 밝히고 있다.
본경에서 세존께서는 비구들에게 출가자가 해야 할 일은 높은 계를 공부짓고[增上戒學, adhisīla-sikkhā] 높은 마음을 공부짓고[增上心學, adhi- citta-sikkhā] 높은 통찰지를 공부짓는 것[增上慧學, adhipaññā-sikkhā]이라고 천명하신다.
만일 출가자가 이러한 계․정․혜 삼학을 공부짓지 않는다면 그는 마치 ‘나는 소다.’라고 하면서 소의 무리를 따르는 당나귀와 같은 사문이어서 진정한 출가자라 할 수 없다고 준엄하게 말씀하신다. 참으로 출가자들이 깊이 명심해야 할 세존의 고구정녕하신 말씀을 담고 있는 귀중한 경이다.
⑿「외움 경」1/2/3(A3:85~87)
본경도 수행자에게는 중요한 경이다. 본경은 사소한 계율[小小戒]에 얽매이기 보다는 계․정․혜 삼학을 균등하게 닦아서 예류자, 일래자, 불환자, 아라한으로 정리되어 설명되고 있는 성자의 과위를 성취하는 것이 중요하다고 설하고 있다. 왜냐하면 높은 계를 공부짓고 높은 마음을 공부짓고 높은 통찰지를 공부짓는 삼학 속에 모든 학습계목은 포함되기 때문이라고 세존께서는 설명하신다.
사소한 계율에 얽매이지 말라 하셨다고 해서 만일 계율은 신경 쓰지 않아도 된다고 받아들인다면 그것은 세존의 금구성언을 잘못 이해하는 것이다. 본경은 절대로 파계자들과 파계를 꿈꾸는 자들에게 깃발이 되어주는 경이 아니기 때문이다.
⒀「소금 덩이 경」(A3:99)
본경에서 세존께서는 먼저 “‘그 사람이 어떤 업을 지었건 그대로 그것을 겪게 된다.’라고 한다면 청정범행을 닦음도 없고 바르게 괴로움을 종식시킬 기회도 없다.”고 말씀하시고, “‘그 사람이 어떤 형태로 겪어야 할 업을 지었건 그것의 과보를 겪게 된다.’라고 한다면 청정범행을 닦음도 있고 바르게 괴로움을 종식시킬 기회도 있다.”고 말씀하신 뒤에, 같은 업을 짓는데 왜 어떤 자에는 무거운 과보를 가져오고 어떤 자에게는 가벼운 과보를 가져오는가를 설명하고 계신다.
세존께서는 소금 덩이를 작은 물 잔에 넣으면 그 물은 엄청나게 짜게 되지만 큰 강에 넣으면 아무런 영향을 주지 못하는 비유와 동전 반개를 훔쳐서 감옥을 가기도 하고 동전 백 개를 훔쳐도 감옥에 가지 않는 등의 비유를 들어서 설명하고 계신다.
본경은 이처럼 왜 같은 업이지만 이렇게 다르고 다양한지를 이해할 수 있는 좋은 경이다. 이런 경들이 바탕이 되어서 아비담마와 주석서에서 업을 16가지 측면에서 설명한다고 여겨진다.
⒁「불순물 제거하는 자 경」(A3:100)
본경은 수행의 과정을 금이 든 광석을 채취하여 순금으로 만드는 여러 공정에다 비유하고 있는 중요한 경이다. 높은 마음을 닦는 비구는 먼저 몸과 말과 마음의 삼업을 맑히고 두 번째로는 감각적 욕망에 대한 생각, 악의에 대한 생각, 해코지에 대한 생각을 맑히고 세 번째로는 친지들에 대한 생각, 지역에 대한 생각, 불명예에 대한 생각을 떨쳐내고 네 번째는 법에 대한 생각을 정화한다. 여기서 법에 대한 생각이란 열 가지 위빳사나의 경계(오염원)에 대한 생각이라고 주석서에서 설명한다.
법에 대한 생각이 정화될 때 그는 최상의 지혜로 실현시킬 수 있는 법이라면 그것이 어떤 것이든지 간에 마음을 기울이면 언제든지 그것을 실현하는 능력을 얻게 된다. 이러한 능력을 바탕으로 신통변화[神足通], 신성한 귀의 요소[天耳界, 天耳通], 다른 중생들의 마음을 꿰뚫어 앎[他心通], 수많은 전생의 갖가지 삶들을 기억함[宿命通], 신성한 눈으로 중생들이 지은 바 업에 따라가는 것을 꿰뚫어 앎[天眼通], 마음의 해탈과 통찰지를 통한 해탈의 실현[漏盡通]이라는 여섯 가지 신통지(초월지)를 얻게 된다.
이렇게 말씀하신 뒤에 다음과 같은 수행에 요긴한 말씀을 하신다.
“높은 마음을 닦는 비구는 때때로 다음의 세 가지 표상을 마음에 잡도리해야 한다. 그는 때때로 삼매의 표상을 마음에 잡도리해야 하고, 때때로 정진의 표상을 마음에 잡도리해야 하고, 때때로 평온의 표상을 마음에 잡도리해야 한다.”
그리고는 이 셋을 조화롭게 닦을 것을 자세하게 말씀하신 뒤에 금세공인이나 그의 도제가 정제되지 않은 금을 잘 제련하여서 무엇이든 원하는 장신구를 만드는 비유를 들어서 설명하시고 경을 끝맺으신다.
이처럼 본경은 수행자가 삼업을 청정히 하는 것에서부터 시작하여 사성제를 관통하고 마음의 해탈과 통찰지를 통한 해탈을 구족하는 최종 단계인 누진통을 포함한 여섯 가지 신통지를 실현하는 수행의 전 과정을 금이 든 광석을 채취하여 순금을 만들어 원하는 장신구를 마음대로 만들어내는 금의 제련과정에 비유해서 설하고 있다.
특히 세 가지 표상에 관한 말씀과 금세공인의 비유가 들어있는 본경의 §§11~15(마지막)까지는『청정도론』VIII.74~76에 인용될 만큼 중요하게 취급되었던 가르침이기도 하다.『청정도론』에 인용된 부분은 본경의 삼분의 일 정도에 해당하는 많은 부분이다.
8. 맺는 말
본서에는『앙굿따라 니까야』의「하나의 모음」(A1)과「둘의 모음」(A2)과「셋의 모음」(A3)에 포함된 1021개의 경들이 수록되어 있다. 비록 경의 길이로는『디가 니까야』의 경들의 길이에 필적하는「팔관재계 경」(A3:70)과 같은 긴 경들도 포함되어 있고 하나의 문장으로 구성된 극히 짧은 경들도 있지만 “모든 부처님 가르침은 해탈의 맛으로는 하나이다.”(DA.i.16)라는『디가 니까야 주석서』의 설명처럼 본서에 포함된 경들은 단 하나의 예외도 없이 모든 중생들로 하여금 악도를 여의고 향상하여 해탈․열반이라는 최고의 가치를 실현하게 하시려는 자애와 연민이 가득한 말씀들이다.
부처님의 육성을 만난 것 같은 이러한 경들을 읽는 독자 모두 해탈․열반의 길로 함께 나아가는 좋은 친구[善友, kalyāna-mitta]가 되기를 기원해본다.
앙굿따라 니까야 (增支部, 숫자별로 모은 경) (1/2/3/4/5/6)
대림 스님 옮김/신국판(양장)
제1권(하나 ~ 셋의 모음): 664쪽 (초판 2006년, 3판 2012년)
제2권(넷의 모음): 656쪽 (초판 2006년, 재판 2012년)
제3권(다섯의 모음): 552쪽 (초판 2007년, 재판 2013년)
제4권(여섯~일곱의 모음): 576쪽 (초판 2007년, 재판 2013년)
제5권(여덟~아홉의 모음): 560쪽 (초판 2007년, 재판 2013년)
제6권(열~열하나의 모음): 624쪽 (초판 2007년, 재판 2013년)
정가: 각권 30,000원
<1권 목차>
- 하나의 모음
- 둘의 모음
Ⅰ. 첫 번째 50개 경들의 묶음
Ⅱ. 두 번째 50개 경들의 묶음
Ⅲ. 세 번째 50개 경들의 묶음
- 셋의 모음
Ⅰ. 첫 번째 50개 경들의 묶음
Ⅱ. 큰 50개 경들의 묶음
Ⅲ. 작은 50개 경들의 모음
<앙굿따라 니까야 역자 서문>
1. 들어가는 말 – 법을 의지하여 머물리라
"아무도 존중할 사람이 없고 의지할 사람이 없이 머문다는 것은 괴로움이다. 참으로 나는 어떤 사문이나 바라문을 존경하고 존중하고 의지하여 머물러야 하는가?"(A4:21)
본서 제2권 「우루웰라 경」1(A4:21)에 나타나는 세존의 성찰이다. 세존께서는 깨달음을 성취하신 뒤 아직 아무에게도 자신의 깨달음을 드러내지 않으셨을 때에1) 우루웰라의 네란자라 강둑에 있는 염소치기의 니그로다 나무 아래에 앉아서 과연 나는 누구를 의지할 것인가를 두고 진지하게 사유하셨다. 경에 의하면 세존께서는 자신이 의지할 자를 찾아서 신들을 포함하고 마라를 포함하고 사문 · 바라문을 포함한 하늘과 인간의 모든 세상 모든 존재를 다 살펴보셨지만 세존께서 구족한 계(戒)와 삼매[定]와 통찰지[慧]와 해탈보다 더 잘 구족한 자를 그 누구도 그 어디에서도 보지 못했다고 한다. 그래서 마침내 세존께서는 이 문제에 대해서 이렇게 결론지으신다.
"참으로 나는 내가 바르게 깨달은 바로 이 법을 존경하고 존중하고 의지하여 머물리라."(A4:21)
그리고 "법을 의지하여 머물리라."는 이러한 부처님의 태도는 부처님이 전법과 교화를 하신 45년간 내내 "법을 의지처로 삼고[法歸依] 법을 섬으로 삼아라[法燈明]."는 가르침과 "자신을 의지처로 삼고[自歸依] 자신을 섬으로 삼아라[自燈明]."는 가르침으로 이어지고 있음을 잘 알고 있다. 우리는 또한 세존께서 반열반하시기 직전에 남기신 첫 번째 유훈도 바로 법과 율이 그대들의 스승이 될 것이라는 것도 잘 알고 있다.2) 세존께서는 말씀하셨다.
"아난다여, 아마 그대들에게 '스승의 가르침은 이제 끝나버렸다. 이제 스승은 계시지 않는다.'라는 이런 생각이 들지도 모른다. 아난다여, 그러나 그렇게 생각해선 안 된다. 아난다여, 내가 가고 난 후에는 내가 그대들에게 가르치고 천명한 법과 율이 그대들의 스승이 될 것이다."(「대반열반경」(D16) §6.1)
이처럼 세존께서는 깨달음을 성취하신 직후에도 스스로 깨달은 법을 의지해서 머물리라고 하셨고, 45년간 제자들에게 설법하실 때에도 법을 강조하셨으며 영원히 사바세계에서 자취를 감추시는 반열반의 마지막 자리에서도 법이 그대들의 스승이 될 것이라 유훈하셨다. 그러므로 세존께서 반열반하고 계시지 않는 지금에 사는 우리가 뼈가 시리고 가슴이 사무치게 존중하면서 배우고 궁구하고 이해하고 실천해야 할 것은 바로 이 법(dhamma)이 아니고 그 무엇이겠는가?
2. 일차합송과 니까야들
"법과 율이 그대들의 스승이 될 것이다."라는 부처님의 유훈을 가슴 깊이 새긴 부처님의 직계제자들은 부처님의 입멸이라는 가슴이 무너지는 슬픔을 뒤로하고 부처님의 존체(尊體, sarīra, 舍利)요 부처님의 진정한 몸[法身]이며 부처님의 화현(아와따라, avatāra)인 세존의 가르침을 결집하는 일에 몰입하였다. 그들은 장장 일곱 달 동안 합송에 몰두하여 세존이 남기신 법과 율을 결집하였던 것이다.
부처님께서는 "법과 율이 그대들의 스승이 될 것이다."라고 하셨다. 그래서 그들은 일단 법의 바구니(Dhamma-Pitaka = Sutta-Pitaka, 經藏)와 율의 바구니(Vinaya-Pitaka, 律藏)라는 두 개의 바구니를 먼저 설정하였다. 그 가운데서 율의 바구니부터 먼저 채우기로 결의하였는데 합송에 참석한 아라한들은 "마하깟사빠 존자시여, 율은 부처님 교법의 생명(āyu)입니다. 율이 확립될 때 교법도 확립됩니다. 그러므로 율을 첫 번째로 합송해야 합니다."(DA.i.11)라고 결정하였기 때문이다.
그런 다음 법의 바구니를 채우기 시작하였는데 법의 바구니는 다시 다섯 개의 니까야(Nikāya)로 나누어서 합송하였다. 일차합송에 참여한 아라한들이 부처님 가르침을 정리하는 제일 첫 번째 기준은 길이와 주제와 숫자의 세 가지였다. 그들은 부처님 가르침을 연대기적으로 정리하는 데는 큰 관심을 보이지 않았다. 그래서 그들은 부처님의 가르침이나 직계제자들의 설법들 가운데서 그 길이가 긴 경들 34개를 모아서 『디가 니까야』(長部)에 담았고 중간 길이로 설하신 가르침들 152개를 합송해서 『맛지마 니까야』(中部)에 담았다. 그다음에는 설법의 주제별로 56개의 주제를 설정한 뒤 그 주제에 해당하는 경들을 함께 모아서(saṁyutta) 『상윳따 니까야』(相應部)를 완성하였다. 그리고 경들에 나타나는 가르침의 숫자[法數]에 주목하여 모두 하나부터 열하나까지의 법수를 가진 모음을 분류한 뒤 경들을 숫자별로 모아서 『앙굿따라 니까야』(增支部)에 합창으로 노래를 불러[合誦] 채워 넣었다.
이런 방법으로 『디가 니까야』 등 네 가지 니까야를 완성한 뒤에 그외에 남은 부처님 말씀이나 여러 스님들의 설법이나 일화나 게송 등은 『쿳다까 니까야』(小部)에 채워 넣었다.
이렇게 합송하여 공인된 『디가 니까야』(장부)에는 모두 34개의 경들이 포함되어 있고 그 분량은 64바나와라3)이며 아난다 존자의 제자들에게 부촉해서 그분들이 계승해 가도록 하였다. 『맛지마 니까야』(중부)에는 모두 152개의 경들이 포함되어 있고 분량은 80바나와라이며 사리뿟따 존자의 제자들이 계승하도록 결의하였다. 『상윳따 니까야』(상응부)에는 모두 7762개의 경들이 포함되어 있고 분량은 100바나와이며 마하깟사빠 존자의 제자들에게 부촉하여 전승하도록 하였다. 『앙굿따라 니까야』(증지부)에는 모두 9557개의 경들이 포함되어 있고 120바나와라 분량이며 아누룻다 존자의 제자들에게 부촉해서 전승하도록 하였다 한다.4)
3. 주제와 숫자가 중복될 경우의 결집 원칙
한편 가르침의 주제와 그 주제의 법수는 중복이 되는 경우가 많다. 예를 들면 사성제는 진리[諦, sacca]라는 주제와도 관련이 있고 넷이라는 숫자와도 관련이 있다. 그러므로『상윳따 니까야』의 「진리 상응」(S56)과도 관련이 있고 『앙굿따라 니까야』의 「넷의 모음」(A4)과도 관련이 있다. 마찬가지로 네 가지 마음챙김의 확립(사념처)은 마음챙김의 확립이라는 주제와도 관련이 있고 넷이라는 숫자와도 관련이 있다. 그러므로 『상윳따 니까야』의 「염처 상응」(S47)으로 결집할 수도 있었고 『앙굿따라 니까야』의 「넷의 모음」에도 포함시킬 가능성이 있었다.
그러나 이런 경우에는 『상윳따 니까야』를 먼저 결집하였기 때문에 『상윳따 니까야』에서 설정한 56개의 주제에 해당되는 주제를 담고 있는 경들은 『상윳따 니까야』 로 먼저 결집을 하였고 『상윳따 니까야』에서 설정한 56개의 주제와 관련 없는 주제를 담고 있는 경들은 그 주제의 법수에 따라서 『앙굿따라 니까야』에 포함시켰다. 그래서 사성제에 관한 경들은 거의 모두 『상윳따 니까야』의 「진리 상응」에 포함되어 있고 『앙굿따라 니까야』의 「넷의 모음」에는 거의 나타나지 않으며, 사념처나 사정근이나 사여의족 등도 마찬가지이다.
그러나『상윳따 니까야』에는 탐 · 진 · 치에 관한 상응이 따로 존재하지 않기 때문에 탐 · 진 · 치에 관계된 가르침은 『앙굿따라 니까야』의 「셋의 모음」에 포함되어 결집되었다.
그 외 법과 율을 율장과 경장과 논장의 삼장(三藏, Tipiṭaka)으로 조직한 상세한 내용은 초기불전연구원에서 역출한 『디가 니까야』 제3권의 부록으로 번역해서 소개하고 있는 『디가 니까야 주석서』서문의 §§30~48에 잘 나타나 있으니 참조하기 바란다. 이 부분은 상좌부 전통에서 본 삼장의 조직체계를 분명하게 밝히고 있기 때문에 역자의 보충 설명은 더 이상 필요하지 않을 것이다. 그리고 『디가 니까야』 제1권 역자 서문에서도 법과 율의 결집에 대해서 상세하게 논하였는데 그곳을 참조하기 바란다.
4. 『앙굿따라 니까야』 (증지부)란 무엇인가
주석서에 의하면 『앙굿따라 니까야』는 4부 니까야 가운데 맨 마지막에 결집한 것이다. 문자적으로 앙굿따라(aṅguttara)는 앙가(aṅga)와 웃따라(uttara)가 합성된 단어로 '구성요소(aṅga)가 [하나씩] 더 높아지는 것(uttara)'이라는 뜻이다. 그래서 『디가니까야 주석서』에서는 "어떤 것이 『앙굿따라 니까야』 인가? [주요 주제의 숫자가] 하나씩, 하나씩 증가하면서 설해진 「마음의 유혹에 대한 경」(A1:1:1) 등의 9557개의 경들이다."(DA.i.15)라고 정의하고 있으며 다시 "「하나의 모음」(Eka-nipāta)과 「둘의 모음」(Dukka-nipāta) 등의 모음에 의한 결집"(DA.i.25)이라고 정의하고 있다. 그래서 『앙굿따라 니까야』를 일본에서는 증지부(增支部)로 옮겼다.
『앙굿따라 니까야』에서는 같은 법수를 포함하고 있는 경들을 모은것을 니빠따(Nipāta)라는 술어로 표현하고 있다. 니빠따는 ni(아래로)+√pat(to fall)에서 파생된 명사로 '아래로 떨어뜨린 것'이라는 일차적인 의미에서 유사한 것끼리 모은 것이라는 의미를 나타내고 있다. 역자는 '모음'으로 옮겼다.
이처럼 『앙굿따라 니까야』(증지부)는 하나와 관련된 가르침부터 열하나와 관련된 가르침까지 그 숫자가 뒤의 모음으로 갈수록 하나씩 증가하는 방법으로 모아서 모두 11개의 모음으로 분리해서 결집하였다. 그래서 『앙굿따라 니까야 주석서』도 『앙굿따라 나까야』는 「하나의 모음」(A1), 「둘의 모음」(A2), …「열하나의 모음」(A11)이라는 11개의 모음이 있고 9557개의 경들이 포함되어 있다고 설명하고 있다.(AA.i.3) 그래서 초기불전연구원에서는 본서를 출간하면서 "숫자별로 모은 경"이라는 부제를 달았다.
한편 숫자가 증가하는 방식의 모음은 이미 『디가 니까야』 「합송경」(D33)과 「십상경」(D34)에도 채용되었다. 「합송경」 은 하나의 주제부터 열의 주제까지 모두 230개의 가르침을 숫자별로 모아서 사리뿟따 존자가 비구대중들에게 설한 가르침이며, 「십상경」 도 역시 사리뿟따 존자가 설한 것인데 각각의 숫자별로 10개의 주제를 설정한 뒤 (1×10) + (2×10) + … + (10×10)하여 모두 550개의 가르침이 10가지 주제 하에 일목요연하게 정리되어 설해지고 있다.
그리고 이러한 숫자별 모음은 이미 인도의 여러 종교계 혹은 사상계에서 일반적으로 통용되던 교설의 분류방법이기도 하다.
부처님 말년에 이를수록 부처님의 가르침은 다 기억하기 힘들 정도로 방대해졌다. 이러한 많은 가르침을 어떻게 모아서 노래하고 기억하여 후대로 전승해 줄 것인가는 직계제자들에게는 중요한 문제가 아닐 수 없었을 것이다. 그러면 어떻게 방대한 부처님 가르침을 체계적으로 모아서 전승시킬 것인가? 그것은 기존의 인도 종교의 전통에서 찾을 수밖에 없었을 것이다.
우리가 잘 알고 있듯이 불교가 생기기 이전에 이미 인도의 여러 바라문 가문들은 각 가문이 속하는 문파에 따라서 베다 본집(本集, Saṁhita)과 제의서(祭儀書, Brāhmaṇa)와 삼림서(森林書, Āraṇyaka)와 비의서(秘義書, Upaniṣad)를 모아서 노래의 형태로 전승해 오는 전통이 튼튼하게 뿌리내리고 있었다. 예를 들면 전체 10장(만달라, Maṇḍala)으로 구성되어 있는 『리그베다』 의 2장부터 7장까지는 『리그베다』파에 속하는 바라문 가문들에서 전승되어 오는 찬미가를 각각 가문별로 모은 것이다. 예를 들면 『디가 니까야』 제1권 「암밧타 경」(D3 §2.8)에서 언급되고 있는 유명한 바라문 가문들 가운데 웻사미따(Sk. Viśvāmitra)는 『리그베다』3장을 전승해온 가문의 이름이며, 와마데와(Sk. Vāmadeva)는 4장을, 바라드와자(Bharadvāja)는 6장을, 와셋타(Sk. Vasiṣṭha)는 7장을 전승해온 가문의 이름이다. 그리고 8장은 깐와와 앙기라스 두 가문의 전승을 모은 것이며, 9장은 제사에서 아주 중요한 소마(Soma) 즙에 관계된 찬미가들을 모은 것이다. 여기에다 1장과 10장은 일종의 잡장인데 가문과 관계없는 시대적으로 늦은 찬미가들을 모아서 구성한 만달라이다.
그리고 『리그베다』의 각 장은 모두 다시 주제별로 모아져 있는데 먼저 바라문들의 신인 아그니에 관계된 찬미가를 모으고, 다음은 인드라, 그다음은 다른 여러 신들의 순서로 모았다. 이처럼 이미 불교가 생기기 이전부터 바라문들은 체계적으로 그들의 찬미가를 모아서 노래로 전승하고 있었다.
그리고 이 방식은 자이나교에도 그대로 적용되어 자이나의 앙가(Aṅga, 앙굿따라(앙가+웃따라)의 앙가와 같은 단어임)들도 다양한 방법론으로 결집되어 전승되어 온다. 물론 정통 자이나교라고 자처하는 공의파(空衣派, Digambara)에서는 마하위라 혹은 나따뿟따의 가르침은 이미 자이나 교단 초기에 인도 중원에 큰 기근이 들어서 자이나 수행자들이 탁발을 쉽게 할 수 있는 남쪽으로 내려가는 와중에 모두 잃어버렸다고 주장한다. 그러나 내려가지 않고 흰 옷을 입고 덜 엄한 고행으로 교단 체제를 바꾼 백의파(白衣派, Śvetāmbara)에서는 지금까지 그들이 전승해 오고 있는 앙가(Aṅga)들을 정전으로 인정하고 있다. 물론 이런 앙가들을 모두 마하위라나 초기 자이나 교단 수행자들의 가르침이라 보기에는 무리가 따르지만 『아야랑가』(Āyaraṅga, Ācaraṅga Sūtra), 『수야가당가』(Sūyagaḍaṅga, Sūtrakṛtanga Sūtra), 불교의 『숫따니빠따』와 같은 성격을 가진『웃따라다야나수뜨라』(Uttarādhyayana Sutra) 등은 언어학적으로나 문헌학적으로도 아주 오래된 것이라고 여러 학자들이 공히 인정한다.
이런 자이나교의 성전인 앙가들 가운데서 세 번째인 『타낭가』 (Thā-ṇaṅga, Stānaṅga)와 네 번째인 『사마와양가』 (Samavāyaṅga)는 『앙굿따라 니까야』 와 같이 숫자별로 정리되어 있는데, 『타낭가』 는 하나부터 10까지, 『사마와양가』 는 하나부터 백만까지의 숫자와 관계된 가르침을 숫자별로 모은 것이다.
한편 인도의 고대 서사시인 『마하바라따』 (Mahābhārata)에도 숫자별로 정리를 하고 있는 부분이 있는데 예를 들면 「우도갸 권」 (Udyoga-parvan)의 「위두라니띠 와꺄」 (Viduraniitivākya)를 들 수 있다.5).
인도 종교계의 사정이 이러하였기 때문에 불교교단도 부처님 말씀을 체계적으로 정리하기 위해서 자연스럽게 이러한 방법론을 그대로 받아 들였으며 특히 사리뿟따 존자와 마하깟사빠 존자와 같은 바라문 가문 출신들에게는 자연스런 추세였을 것이다.
5. 『앙굿따라 니까야』의 구성
이처럼 『앙굿따라 니까야』 는 니빠따(nipāta, 모음)라 불리는 숫자별로 분류한 11개의 모음으로 구성되어 있다. 각 모음은 많은 경들을 포함하고 있는데 주석서에 의하면 모두 9557개의 경들을 포함하고 있다고 설명하고 있으며 니까야들 가운데 가장 많은 경들을 포함하고 있다. 모음별로 분류된 경들은 다시 50개씩의 경들로 묶어서 분류하고 있는데 이것을 '50개 경들의 묶음(Paṇṇāsaka)'이라 부르고 있다. 빤나사까는 문자그대로 '50개로 된 것'이라는 의미이다. 이러한 50개의 묶음은 『맛지마 니까야』와 『상윳따 니까야』 에도 나타나고 있다.
이처럼 한 묶음에 포함된 50개의 경들은 다시 5개의 '품(Vagga)'으로 분류가 되는데 하나의 품은 기본적으로 10개씩의 경들을 포함하고 있다. 이렇게 조직하여 전체 9557개의 경들을 일목요연하게 정리한 것이 『앙굿따라 니까야』 이다.
이러한 분류법은 물론 『맛지마 니까야』와『상윳따 니까야』에도 적용되는 공통적인 방법이다. 『맛지마 니까야』의 152개의 경들은 모두 50개씩 세 개의 묶음으로 분류가 되고 이러한 묶음에는 다시 각각 다섯 개의 품으로 분류가 되며 각 품은 10개씩의 경을 포함하고 있다.
『상윳따 니까야』에 포함된 7762개의 경들은 모두 56개 주제별로 함께 모아서(saṁyutta) 분류하였으며 각각의 상응들 가운데 많은 경을 포함한 상응은 다시 50개씩의 묶음과 품으로 분류하여 편집하였다. 『디가 니까야』에 포함된 경들은 34개뿐이라서 50개의 묶음은 존재하지 않으며 품별로 3개의 품으로 나누어서 각각을 계온품(13개의 경들이 포함됨), 대품(10개의 경들), 빠띠까 품(11개의 경들)이라 부르고 있다. 이처럼 모든 니까야에서 많은 경들을 배열하는 데는 이것이 기본 원칙이다.
그러면 같은 모음 안에서 경들의 순서를 정하는 정해진 원칙이 있는가? 원칙을 찾으려고 노력한 흔적은 많지만 모든 묶음들과 품들이 반드시 정해진 원칙에 의해서 결집된 것은 아닌 듯하다. 물론 각 모음 별로 나름대로의 원칙이 없는 것은 아니다. 예를 들면 본서 제2권의 「넷의 모음」에 포함된 271개의 경들은 먼저 다섯 개의 50개 경들의 묶음으로 나누었고 경들 가운데 게송을 포함하고 있는 경들 70개는 제일 앞에 배열하였다. 그리고 그 나머지 경들 가운데서 긴 경들은 「큰 50개 경들의 묶음」 으로 모아서 네 번째 묶음으로 편집했다. 본서 제1권의 「셋의 모음」에 포함된 163개의 경들도 먼저 세 개의 묶음으로 나누고 긴 경들 50개는 두 번째 묶음으로 편집하고 아주 짧은 경들은 세 번째 묶음으로 편집하여 각각 「큰 50개 경들의 묶음」과 「작은 50개 경들의 묶음」이라 칭하였다. 그리고 품들 가운데서도 공통된 경들을 모은 품들이 다수 발견된다. 예를 들면 본서의 「둘의 모음」의 두 번째 50개 경들의 묶음에 포함된 5개의 품들은 모두 각 품에 공통되는 것을 중심으로 모았다.
6. 『앙굿따라 니까야』의 경은 모두 몇 개인가?
『앙굿따라 니까야 주석서』(AA.i.3)와 『디가 니까야 주석서』 등에 의하면 『앙굿따라 니까야』 에는 모두 9557개의 경이 포함되어 있는 것으로 확정되어 있다. 육차결집본에 의하면 모두 7231개경으로 편집되어 있다. PTS본을 통해서는 정확하게 몇 개의 경이 있는지를 알기 힘들다. 우드워드의 영역본을 참조하고 히뉘버 교수의 제안을 받아들이고6) 육차결집본과 비교해서 도표로 나타내어 보면 다음 페이지의 도표와 같다.
그러면 PTS본과 육차결집본의 경의 개수가 왜 이렇게 차이가 나는가? 먼저 분명히 밝히고 싶은 것은 내용에는 하나도 다른 부분이 없다는 것이다. 두 판본뿐만 아니라 다른 스리랑카나 태국의 여러 공식 판본과 필사본까지도 단어의 철자법이 다른 부분은 적지 않게 있고 혹 문장이 생략된 부분이 나타나기도 하지만, 내용이 다른 경이 새로 첨가된다거나 특정한 경이 생략된다거나 하는 경우는 없는 것으로 보인다.
번호
모음
PTS본
육차본
PTS권별
본서권별
A1
하나의 모음
575
611
제1권
제1권
A2
둘의 모음
283
246
제1권
제1권
A3
셋의 모음
163
184
제1권
제1권
A4
넷의 모음
271
783
제2권
제2권
A5
다섯의 모음
365
1151
제3권
제3권
A6
여섯의 모음
156
649
제3권
제4권
A7
일곱의 모음
96
1132
제4권
제4권
A8
여덟의 모음
96
626
제4권
제5권
A9
아홉의 모음
95
432
제4권
제5권
A10
열의 모음
219
746
제5권
제6권
A11
열하나의 모음
25
671
제5권
제6권
합계
11개 모음
2344
7231
전5권
전6권
* 육차본은 육차결집본(인도 Vipassana Research Institute 간행)을 뜻함.
그런데도 불구하고 두 판본에 나타나는 경의 개수가 왜 이렇게 차이가 나는가? 그것은 후대에 경을 편집하는 편집자들 혹은 결집회의의 주재자들이 경을 어떻게 편집하여 개수를 정했는가 하는 차이이다. 그래서 판본에 따라서 어떤 경은 앞 경에 포함된 것으로 편집되어 나타나기도 하고 어떤 부분은 한 경에서 독립된 경으로 편집되기도 한 것이다. 예를 들면 본서 제1권 「아난다 경」(A3:32) §2의 주해와 「사대천왕 경」2(A3:37)의 주해를 참조하기 바란다. 이런 차이일 뿐이지 경의 내용이 첨가되거나 생략된 부분은 없다.
그런데 경의 숫자의 차이가 배 이상이 되는 모음이 아주 많다. 예를 들면 PTS본의 「넷의 모음」은 271개의 경들로 번호가 매겨져 있지만 육차결집본에는 783개의 경들로 번호가 매겨져 있다. 어떻게 해서 이렇게 큰 차이를 보일 수가 있을까? 먼저 살펴봐야 할 점은 제28장 「탐욕의 반복 품」 이전의 부분들에서 PTS는 270개의 경으로 편집을 하였고 육차결집본은 273개의 경으로 편집을 하여 큰 차이가 없다.
「넷의 모음」에 포함된 경들의 숫자가 배 이상 차이가 나는 것은 오직 한 부분, 즉 「넷의 모음」의 맨 마지막 부분인 제28장 「탐욕의 반복 품」(Rāga-peyyāla, A4:271)을 어떻게 편집했느냐 하는 것에서 비롯된다. PTS본은 이 28장 「탐욕의 반복 품」 을 모두 하나의 경으로 취급하여 편집하였다. 그러나 육차결집본은 이 부분에 무려 510개의 경 번호를 매겼다. 이렇게 해서 전체적으로 모두 783개의 경이 된 것이다.
좀 더 자세히 살펴보면 「탐욕의 반복 품」에 나타나는 기본 내용은 '탐욕 · 성냄 · 어리석음부터 허영과 방일까지의 17개의 불선법을, 최상의 지혜로 앎과 철저히 앎부터 방기함까지의 10가지 방법으로 해결하기 위해서는, 사념처와 사정근과 사여의족의 3가지를 닦아야 한다.'는 것이다. 이렇게 해서 육차결집본은 17(탐, 진, 치, 분노 등) × 10(최상의 지혜로 앎, 철저히 앎 등) × 3(사념처+사정근+사여의족) = 510 개의 경들이 「탐욕의 반복 품」에 포함되어 있는 것으로 편집하고 있다. 그러나 역자의 저본인 PTS본에는 하나의 경으로 묶었다. 이렇게 해서 무려 510개의 차이가 나는 것이다.
거듭 밝히지만, 이렇게 PTS본에서 하나의 경으로 편집된 것이 육차결집본에는 510개의 경의 번호를 매겨서 편집하였지만 그 내용은 한 부분도 차이가 없다. 편집자가 경 번호를 어떻게 매겼냐 하는 차이뿐이다.
그런데 이 「탐욕의 반복」은 「셋의 모음」부터 「열하나의 모음」까지 『앙굿따라 니까야』의 모든 모음의 마지막에 항상 나타나고 있다. 육차 결집본은 이것을 모두 그 문맥에 맞추어서 많은 경들의 번호를 매기고 있고 PTS본은 하나 혹은 몇 개의 경들로 취급하고 있다. 이런 차이 때문에 두 판본의 경의 개수는 세 배 이상이 차이가 나는 것이다.
그러면 육차결집본은 왜 이렇게 편집하였을까? 이것이 승가의 전통적인 태도이기 때문이다. 거듭 밝히지만 상좌부에서는 전통적으로 『앙굿따라 니까야』에는 모두 9557개의 경들이 있다고 간주한다. 육차결집본은 이러한 전통을 그대로 계승하고 있기 때문에 이렇게 경의 개수를 매기는 것이다. 이렇게 해서 육차결집본의 편집에 따르면 모두 7231개의 경이 존재하게 되는데 붓다고사 스님이 밝힌 9557보다 2326개가 부족하다. 그러나 육차결집본에 한 개의 경으로 편집되어 있는 「셋의 모음」의 마지막인 「탐욕의 반복」 을 육차결집본의 「넷의 모음」의 「탐욕의 반복」 과 같은 방법으로 17(탐, 진, 치, 분노 등) × 10(최상의 지혜로 앎, 철저히 앎 등) = 170개의 경들로 편집하고, 같은 방법으로 「다섯의 모음」 등도 이렇게 편집한다면 육차결집본의 경의 개수는 9557개에 상당히 근접하게 될 것이다. 그래서 육차결집본은 9557이라는 숫자에 근접하기 위해서 이러한 편집을 하였다고 여겨진다. 그러나 이러한 전통에 별 관심이 없는 서양학자들은 그들 기준으로 경을 편집하였다.
육차결집본은 1957년에 미안먀 양곤에서 마무리된 6차결집에서 공식으로 승인된 것이기 때문에 승가의 전통을 가장 잘 보존하고 있다고 생각된다. 그러나 초기불전연구원은 세계 학계에서 기본 판본으로 자리 매김한 PTS본을 저본으로 할 수 밖에 없었으며 두 판본의 편집 차이는 가급적 모두 주해에서 밝히려 하고 있다. 이하 본 해제에서도 별다른 언급이 없는 한 경의 번호나 경의 언급은 모두 PTS본에 근거한 것임을 밝힌다.
7. 『앙굿따라 니까야』 에 포함된 경들의 편집 방법
첫째, "이와 같이 나는 들었다.(evaṁ me sutaṁ)"를 생략해서 편집하고 있다.
불교 경전에 조금 익숙한 독자들은 『앙굿따라 니까야』에 나타나는 경들을 보고 의아해하게 될 것이다. 왜냐하면 A1, A2 등, 각 모음(nipāta)의 첫 번째 경을 제외한 모든 경들에서 "이와 같이 나는 들었다."는 정형구가 나타나지 않기 때문이다. 이 문장은 대승경들을 포함한 모든 불교 경전에서 경의 권위를 확보하기 위해서 반드시 나타나는 문장인데 『앙굿따라 니까야』에서는 대부분 생략되어 있다. 그 이유가 무엇인가? 다른 특별한 이유는 없다. 『앙굿따라 니까야』의 경들은 숫자가 너무 많고 특히 그 길이가 짧기 때문에 경을 편집한 옛 스승들이 이 문장을 모두 생략해서 편집했을 뿐이다.
둘째, 급고독원에서 설하신 경들도 설법처(說法處)가 생략되었다.
그리고 급고독원에서 설하신 모든 경들에 나타나는 두 번째 정형구인 "한때 세존께서는 사왓티에서 제따 숲의 급고독원에 머무셨다."는 부분도 나타나지 않는 경들이 대부분이다. 이것은 어떻게 이해해야 할 것인가? 『앙굿따라 니까야』 경들의 대부분은 사왓티에 있는 제따 숲의 급고독원에서 설하신 것이다. 그래서 각 모음의 제일 처음 경(A1:1:1; A2:1:1; A3:1; A4:1 등)만 모든 정형구를 다 갖추어 편집하고 나머지 경들에서는 이 부분도 모두 생략해서 편집하였다. 물론 급고독원에서 설하지 않은 경들이나 세존께서 설하시지 않은 경들은 그 설법처와 설법자와 청법자등을 분명하게 밝히고 있다. 예를 들면 본서 「족쇄 경」(A2:4:5)과 「살하경」(A3:66) 등이다.
그러므로 사왓티의 급고독원에서 세존께서 설하신 경들의 경우에는 "이와 같이 나는 들었다. 한때 세존께서는 사왓티에서 제따 숲의 급고독원에 머무셨다."는 기본 정형구를 생략하고 있으며 이와 다른 경들은 모두 설법처와 설법자와 청법자를 분명하게 밝히고 있다. 그러므로 이러한 정형구가 나타나지 않는 경들은 모두 사왓티의 급고독원에서 세존께서 설하신 것이다.
그리고 이러한 편집은 이미 오래된 필사본들에서부터 전승되어 오며 스리랑카, 미얀마, 태국, 그리고 PTS본까지 모든 판본에서 한결같다는 점을 알아야 한다. 초기불전연구원에서 이렇게 생략해서 번역한 것이 결코 아님을 밝힌다.
8. 경의 이름
전통적으로 빠알리 문헌에서는 품의 명칭과 경의 이름은 그 품이나 그 경의 맨 마지막에 "어떤 품이 끝났다."라거나 "어떤 경이 끝났다."는 방법으로 언급되고 있다. 특히 PTS본『앙굿따라 니까야』는 전부 이렇게 편집되어 있다. 이것은 어떤 글의 제목을 맨 처음에 드러내는 현대식 방법과는 완전히 반대이다. 그러나 우리는 이미 현대식 방법에 많이 익숙해 있기 때문에 초기불전연구원의 모든 번역서는 현대식 방법에 따라 품이나 경의 이름을 모두 먼저 밝히고 이를 번역해 내고 있다.
PTS본에 의하면 본서 제1권의 경우 품의 명칭은 각 품이 끝나는 곳에 나타나고 있으며 경의 이름은 제1권 맨 마지막에 「하나의 모음」과 「둘의 모음」과 「셋의 모음」의 경의 이름을 모두 모아놓았다.(이것을 uddāna라 하는데 역자는 '권말 목록'으로 옮겼다.) 이것을 토대로 역자는 각 경 의 맨 처음에 경의 이름을 넣었다.
그리고 권말 목록(uddāna)은 모두 게송으로 되어 있기 때문에 '경(sutta)'이라는 단어가 모두 나타나지 않는다. 그러다 보니 PTS의 영역본을 위시한 대부분의 서양 번역에는 제목에 대부분 경(sutta)이라는 단어가 나타나지 않는다. 그러나 권말 목록은 게송의 형식으로 경의 이름만을 나열하고 있기 때문에 경(sutta)이라는 표기를 하지 않았을 뿐 이것은 엄연한 경이다. 주석서들에도 별다른 예외가 없는 한 경(sutta)이라는 단어를 명기하고 있으며 DPPN에도 반드시 경으로 표기하고 있다.
그리고 육차결집본은 짧은 경들의 경우에도 극히 짧은 「하나의 모음」만 제외하고 「둘의 모음」부터는 예외 없이 모두 경(sutta)이라고 표기하고 있다. 초기불전연구원에서도 이를 살려서 「둘의 모음」부터는 경을 넣어서 "허물 경," "노력 경" 등으로 표기하고 있다. 경이란 부처님 말씀으로 공인되었다는 의미를 내포하고 있기 때문이다.
경이라는 단어를 넣어서 경의 이름을 적다보니 「나무껍질로 만든 옷 경」(A3:97)이라든지 「화장터 나무토막 경」(A4:95)이라든지 하는 어색한 경우가 종종 발견된다. 그러나 부처님 말씀으로 공인되었다는 의미의 경이라는 단어를 넣어야 하는 것이 부처님 제자 된 도리라 생각하여 「하나의 모음」 만 제외하고 나머지는 모두 경이라는 단어를 넣어서 표기하였다. 경은 부처님 말씀이요 부처님 말씀은 단순한 성인의 전기나 역사서가 아니기 때문이다. 부처님의 말씀으로 공인된 경은 도를 추구하고 해탈 · 열반을 실현하고자 하는 수행자들의 목숨과도 같은 것이고, 모든 인류의 영원한 지남이 되는 금구성언이기 때문이다.
9. 경의 번호
역자가 경의 번호를 매긴 원칙은 다음과 같다.
『앙굿따라 니까야』의 모든 경들은 A로 시작한다. A는 Aṅguttara Nikāya(앙굿따라 니까야)를 뜻한다. A1은 『앙굿따라 니까야』「하나의 모음」을 뜻하고, A2는 「둘의 모음」을, A3은 「셋의 모음」을, A4는 「넷의 모음」을 뜻하며, 같이하여 A11은 「열하나의 모음」을 뜻한다.
그리고 「하나의 모음」과 「둘의 모음」은 품의 번호를 중심으로 하여 경의 번호를 매겼다. 그러므로 A1:12:2는 『앙굿따라 니까야』「하나의 모음」의 제12품의 두 번째 경이라는 의미이며, A2:10:4는 『앙굿따라 니까야』「둘의 모음」의 제10품의 네 번째 경이라는 의미이다.
「셋의 모음」과 「넷의 모음」이하는 품을 표기하지 않고 경의 순서를 중시하여 경의 번호를 매겼다. 예를 들면 A3:74는 『앙굿따라 니까야』「셋의 모음」의 74번째 경이라는 의미이고, A4:100은 『앙굿따라 니까야』 「넷의 모음」 100번째 경이라는 의미이다.
이렇게 「하나의 모음」과 「둘의 모음」은 품을 중심으로 번호를 매기고, 「셋의 모음」과 「넷의 모음」이하 「열하나의 모음」까지는 경을 중심으로 번호를 매긴 것은 PTS본의 쪽 번호에 이렇게 나타나고 있기 때문이다. 육차결집본은 「하나의 모음」과 「둘의 모음」도 모두 경을 중심으로 하여 일련번호를 매기고 있지만 본 번역의 저본인 PTS본이 합리적이라 생각하여 이를 따랐다.
10. 번역에 임한 태도
이미 초기불전연구원에서 역출한 다른 책들의 서문 등에서 밝혔지만 역자를 위시한 초기불전연구원의 역경승들은 경을 옮김에 있어서 몇 가지 원칙을 중시하고 있다. 이미 『디가 니까야』 서문에서 밝혔지만 다시 간추리면 다음과 같다.
첫째, 주석서를 중시하였다.
경은 단순한 전기가 아니라 부처님의 말씀이다. 이것은 해탈 · 열반을 실현하는 체계를 고스란히 담고 있는 정전(正典)이다. 경에 대한 이해는 단순한 언어학적 소양만으로는 결코 성취되지 않는다. 경은 부처님의 직계제자들이 이해하고 받아들였던 그분들의 안목을 빌지 않고서는 결코 심도 깊게 이해될 수 없다. 그러면 어떻게 부처님 말씀을 이해해야 할 것인가? 경에 나타나는 특정한 술어와 특정한 구문과 특정한 배경과 특정한 문맥은 어떻게 이해해야 할 것인가?
이 문제를 철저하게 고민한 것이 바로 주석서 문헌(Aṭṭhakathā)이다.
그러므로 주석서는 삼장(Tipiṭaka)에 대한 가장 오래된 권위이다.
둘째, 『청정도론』을 중시하였다.
이미 『청정도론』 해제에서 밝혔듯이 『청정도론』은 그 성격상 4부 니까야 전체에 대한 주석서이다. 그러므로 4부 니까야 전체에 나타나는 중요한 술어와 개념은 거의 대부분 『청정도론』에 설명되어 있다. 그리고 이러한 중요한 술어들은 『청정도론』에서 설명되었기 때문에 각 니까야의 주석서들에서는 더 이상 설명하지 않고 " 『청정도론』에서 상세하게 설명하였다."라고만 할 뿐이다. 그런 만큼『청정도론』 없는 주석서는 생각할 수 없으며 『청정도론』을 이해하지 못하고서는 초기경의 체계를 제대로 이해할 수 없다.
혹자는 주석서나『청정도론』을 단순히 붓다고사(Buddhagosa)라는 뛰어난 주석가의 견해 정도로 치부하려 한다. 그러나 『청정도론』 서문에서 정리하였듯이 주석서나 『청정도론』은 결코 붓다고사 스님의 개인작품이 아니라 상좌부에서 전승되어 오던 정통견해를 정리해서 빠알리어로 옮긴 것이다. 붓다고사 스님은 각 주석서의 서시와 후기 등에서 이러한 사실을 누차 강조하고 있다.
셋째, 『아비담마 길라잡이』를 중시하였다.
『청정도론』은 다시 『아비담맛타 상가하』(『아비담마 길라잡이』)가 없이는 그 핵심이 되는 술어와 가르침을 파악하기가 결코 쉽지 않다. 이런 이유로 초기불전연구원에서는 먼저 『아비담마 길라잡이』를 상 · 하로 출간하였고 이를 토대로 『청정도론』을 세 권으로 출간한 것이다. 이미 많은 분들이 『아비담마 길라잡이』를 읽고 호평을 해주셨듯이 『아비담마 길라잡이』는 교학에 대한 정확한 이해가 결여된 한국 땅에서 부처님 가르침의 정확한 길라잡이가 되리라 확신한다.
그러므로 본서를 번역 출간하면서 『청정도론』과 『아비담마 길라잡이』를 토대로 하였으며 주해에서 『청정도론』과 『아비담마 길라잡이』의 해당 부분을 지적하여 참고하도록 하였다.
넷째, 술어를 한글화하였다
이미 『청정도론』해제와『아비담마 길라잡이』서문 및 『디가 니까야』 역자서문에서도 밝혔듯이 초기불전연구원에서는 모든 술어들을 가급적이면 한글로 풀어 적는다는 원칙을 세웠다. 그 원칙은 『앙굿따라 니까야』 의 번역에서도 철저하게 유지되고 있다.
물론 이렇게 하다보면 한문 용어에 익숙한 분들은 당황스럽고 짜증나기 마련일 것이다. 그래서 한문 불교 용어에 익숙한 분들을 위해서 많은 곳에서 눈의 알음알이[眼識], 무더기[蘊], 기능[根] 등으로 한문을 병기했다. 그리고 무리하게 한글식 표기만을 고집하지는 않았다. 오히려 지금 절집에서 통용되는 한자말들은 그대로 사용하려 노력하였다.
다섯째, 존칭에 대한 원칙을 정하였다
이미 『디가 니까야』 역자서문에서 밝혔듯이 존칭은 다음과 같은 원칙을 정하였다.
① 모든 사람들(신들 포함)이 부처님께 말씀을 드릴 때는 모두 경어체로 표기한다.
② 부처님이 아주 연장자임이 분명한 사람에게 말씀하실 때는 존칭어로 옮긴다.
③ 그 외 부처님의 말씀은 모두 평어체로 옮긴다.
④ 그 외 비구가 비구들에게, 비구가 재가자들에게, 재가자가 재가자들에게 등의 경우에는 상호 존칭어로 옮긴다.
⑤ 부처님과 유력한 신들이나 왕들과의 대화는 상호 경어체로 했다.
11. 맺는 말
빠알리 삼장의 한글완역을 표방하고 초기불전연구원이 개원한지 4년이 되었다. 초기불전연구원은 2002년 10월에 개원하면서 바로 『아비담맛타 상가하』를 『아비담마 길라잡이』(상 · 하)로 번역해 냈는데 지금까지 4판이 거의 매진될 정도로 꾸준히 독자들의 관심을 끌고 있다. 이를 바탕으로 2004년에는 초기불전을 이해하는 노둣돌인 『청정도론』을 전3권으로 번역하여 교계의 큰 호평을 받았다. 그리고 초기불교 수행의 지침서가 되는 「대념처경」과 그 주석서를 『네 가지 마음챙기는 공부』로 엮어 내었고 「출입식념경」과 「염신경」과 이에 관계되는 주석서 문헌들을 발췌하여 『들숨날숨에 마음챙기는 공부』를 출간하고 이 두 책은 개정판까지 내면서 수행에 관심있는 분들에게 사랑을 받고 있다.
그리고 올 초에는 마침내 빠알리 경장의 첫 번째 니까야인 『디가 니까야』(길게 설하신 경)를 전3권으로 역출해내면서 이제 본격적으로 빠알리 삼장의 역경작업에 매진하고 있다.
이러한 성과를 바탕으로 이제 『앙굿따라 니까야』의 제1권과 제2권을 역출해내게 되었다. 순서상 『디가 니까야』 다음에는 『맛지마 니까야』가 출간되어야 하겠으나 여러 관심 있는 분들의 부탁과 조언을 바탕으로 『앙굿따라 니꺄야』부터 먼저 간행하게 되었으며 『앙굿따라 니까야』는 그 분량이 많기 때문에 먼저 제1권과 제2권을 출간하고 나머지 책들은 연이어서 간행할 예정이다. 독자 여러분들의 많은 성원과 후원과 관심을 부탁드린다.
이제 『앙굿따라 니까야』 제1권과 제2권을 역출해낸다. 경의 출판에 정재를 희사해주시고 교정과 편집에 동참해주시고 여러 가지 잡다한 일들을 부처님 일이라는 거룩한 마음으로 기꺼이 감내해주신 모든 분들께 엎드려 절을 올리며 감사의 마음을 전한다. 그분들의 존함은 『앙굿따라 니까야』 마지막 권에서 일일이 밝히도록 하겠다.
책을 출판하면서 역경불사를 한다는 환희심보다는 금구의 말씀을 혹시 잘못 번역하지는 않았는지 두려운 마음이 더 크다. 만일 잘못된 부분이 있다면 그것은 모두 역자의 역량이 부족한 탓이다. 이상하거나 애매한 부분을 발견하신 독자들께서는 언제든지 연락 주시어 다음 번 출간에서 바로 잡을 수 있도록 도와주시기를 기원한다.
『앙굿따라 니까야』 제1권과 제2권을 삼보님 전에 봉헌하면서 역자 서문을 접는다.
이 세상에 부처님 가르침이 오래오래 머물기를!
<앙굿따라 니까야 제1권 해제(解題)>
1. 들어가는 말
『앙굿따라 니까야』는 부처님이 남기신 가르침 가운데서 그 주제의 법수가 분명한 말씀들을 숫자별로 모아서 결집한 것이다.『앙굿따라 니까야』는 이러한 주제를 하나부터(A1) 열하나까지(A11) 모두 11개의 모음(Nipāta)으로 분류하여 결집하였다.
『앙굿따라 니까야』제1권에는「하나의 모음」(Eka-nipāta, A1)과「둘의 모음」(Dukka-nipāta, A2)과「셋의 모음」(Tikka-nipāta, A3)의 세 가지 모음이 수록되어 있다.「하나의 모음」은 부처님 말씀 가운데 하나의 주제를 담고 있는 경들을 모은 것이며,「둘의 모음」은 두 개의 주제를 담고 있는 경들을,「셋의 모음」은 세 개의 주제를 담고 있는 경들을 모은 것으로, 각각 575개의 경들과 283개의 경들과 163개의 경들을 포함하고 있다.
「하나의 모음」과「둘의 모음」은 대부분『법집론』(Dhs)의 앞부분에 나타나는「둘의 논모」(Dukka-mātikā)들처럼 짧은 문장의 경들로 구성되어 있지만「셋의 모음」부터는 일반적인 경의 형식을 갖춘 경들이 주종을 이루고 있다.
「하나의 모음」에 포함된 575개의 경들은 단 하나의 주제를 설명 없이 나열하고 있는 경들이 대부분이기 때문에 그 길이가 극히 짧다. 그래서 독립된 경으로 간주하기가 힘들다. 그리고 이 가르침들을 모두 경이라는 이름을 붙이면 지면이 너무 많아지게 되므로 역자는 단순히 경의 번호만을 표기하고 있다.「둘의 모음」부터는 경의 이름과 경의 번호를 표기하여도 될 만큼 분명한 주제를 담고 있어서 경의 이름과 번호를 표기하여 옮겼다. 그러나「둘의 모음」 제15장「증득 품」과 제16장「분노 품」의 117개 경들은 짝이 되는 두 가지 법수만을 나열하고 있는 극히 짧은 것이라서 지면상 경의 이름을 명기하지 않았다.「셋의 모음」은 독립된 경으로 간주할 수 있을 만큼 내용과 길이를 갖춘 경들이 대부분이다.
2.「하나의 모음」
『앙굿따라 니까야』「하나의 모음」에는 모두 575개 경들이 포함되어 있다. 경이지만 서언 부분을 뺀 본문은 대부분 한 개나 몇 개의 간단한 문장으로 구성되어 있는 지극히 짧은 가르침이 거의 전부이다. 그렇다고 해서「하나의 모음」을 소홀히 여기면 곤란하다. 이들은 비록 짧지만 초기불교의 중요한 법수들을 일목요연하게 나열하고 있는 경들이기 때문이다. 이 경들을 모두 21개의 품(Vagga)으로 나누어서 각 품마다 기본적으로 대략 10개씩의 경들을 배당하고 있다. 각 품을 중심으로 그 특징과 내용을 간단하게 살펴보는 것으로「하나의 모음」에 대한 해제에 대신하고자 한다.
제1장「형상 등의 품」(A1:1:1~10)
본 품은 남자가 여자에게 어떻게 유혹되며 반대로 여자가 남자에게 어떻게 유혹되는가를 적나라하게 밝히고 있다. 본 품에서 부처님께서는 남녀가 각각에게 유혹되는 것은 다름 아니라 각각이 가진 형상, 소리, 향기, 맛, 감촉(색․성․향․미․촉)의 다섯 가지 대상임을 설하고 계신다. 유혹은 갑자기 이유 없이 생기는 것이 아니라 모두 감각기능-감각대상-알음알이(근․경․식)의 연기구조 속에서 일어나고 사라지는 것이라고 설하고 계신다.
제2장「장애의 극복 품」(A1:2:1~10)
본 품은 다섯 가지 장애[五蓋]가 어떻게 일어나는가를 밝히고(§§1~5), 다시 이 다섯 가지 장애를 어떻게 극복하는 가를 밝히는(§§6~10) 중요한 품이다.
제3장「다루기 힘듦 품」(A1:3:1~10)
제4장「제어되지 않음 품」(A1:4:1~10)
이 두 품의 20가지 경들은 마음을 쌍으로 살펴보고 있다. 주석서는 이것을 윤회하는 마음과 윤회를 벗어나는 마음의 쌍으로 다음과 같이 설명한다.
“여기 [본 품에 쌍으로 나타나는 경들]에서 첫 번째로 [경에서 언급되는] 마음은 윤회하는(vaṭṭa) 마음이고 두 번째로 [경에서 언급되는] 마음은 윤회를 벗어나는(vivaṭṭa) 마음이다.
여기서 먼저 윤회(vaṭṭa)와 윤회의 발판(vaṭṭa-pāda)과 윤회를 벗어남(vivaṭṭa)과 윤회를 벗어나는 발판(vivaṭṭapāda)을 구분해서 알아야 한다. 윤회란 삼계윤회(tebhūmaka-vaṭṭa)를 말한다. 윤회의 발판이란 윤회를 하게 하는 업(kamma)을 말한다. 윤회를 벗어남이란 9가지 출세간법을 말한다. 윤회를 벗어나는 발판이란 윤회에서 벗어나게 하는 업을 말한다. 그러나 [본 품에 나타나는] 이 경들에서는 오직 윤회와 윤회에서 벗어남만을 설하고 있다.”(AA.i.52)
제5장「바르게 놓이지 않음 품」(A1:5:1~10)
본 품도 마음을 여러 측면에서 고찰하고 있다. 특히 8번째 경은 마음의 찰나성을 드러내고 있으며 9번째 경은 “비구들이여, 이 마음은 빛난다. 그러나 그 마음은 객으로 온 오염원들에 의해 오염되었다.”라고 하여 마음의 청정함과 객진번뇌(客塵煩惱)를 설명하고 있다.
이 가르침은 대승불교에서『능가경』이나 대승『열반경』 등 여러 경과 논서들을 통해서 객진번뇌로 정착이 되었다. 특히『능가경』에서 “以如來藏是清淨相 客塵煩惱垢染不淨(여래장은 본래 청정한 것이지만 객으로 온 번뇌에 오염되어서 깨끗하지 못하다.)”이라고 하였듯이 특히 여래장 사상에 지대한 영향을 주었다. 흥미로운 것은 한역『아함부』경들에서는 이러한 가르침이 나타나지 않는다는 사실이다.
우리가 유념해야 할 것은 초기불교에서 오직 이 곳에만 나타나는 이런 본자청정 객진번뇌의 가르침을 두고 부처님께서는 본자청정하고 더군다나 ‘영원불멸한’ 마음을 설하신 것으로 확대해석하는 것은 참으로 곤란하다는 점이다.
초기경들 전반에서 예외 없이 마음은 항상 연기적 존재이고 대상 없이는 일어나지 않는다. 그래서 조건생․조건멸이고 찰나생․찰나멸인 마음에 대해 바로 앞의 8번째 경에서는 마음은 너무나 빨리 변하기 때문에 어떤 비유로도 설명할 수 없다고 강조하고 있다. 마음을 불변하는 그 무엇으로 상정해버리면 그것은 즉시에 외도의 자아이론과 같아지고 만다는 것을 명심해야 할 것이다.
제6장「손가락 튀기기 품」(A1:6:1~10)
제7장「열심히 정진함 등의 품」(A1:7:1~10)
제8장「선우 등의 품」(A1:8:1~10)
제9장「방일 등의 품」(A1:9:1~17)
제10장「비법 등의 품」(A1:10:1~42)
앞부분인 제3품부터 제5품까지의 경들에서는 30가지 측면에서 마음의 여러 가지 성질을 고찰해보았으며 이하 제6품부터 제10품까지의 경들의 대부분은 이러한 마음을 닦고 개발하는 것을 간략하게 설하고 있다. 그 방법으로 객진번뇌의 이해, 자애의 마음을 닦음 등을 들고 있으며 선법과 불선법을 일어나게 하는 것들을 여러 가지 들고 있다.(1:6:6~1:8:3) 그리고 제9품의 마지막까지 계속해서 유익한 심리현상들과 해로운 심리현상들에 관계된 여러 가지를 나열하고 있다.
제11장「비법 품」(A1:11:1~10)
제10품 33번 경부터 본 품까지는 법과 비법(非法), 율과 비율(非律)에 대해서 언급하고 있다.
제12장「범계가 아님 등의 품」(A1:12:1~20)
위 제11품의 율과 비율의 언급을 더 발전시켜서 여기서는 여러 가지 범계와 범계 아님에 대해서 살펴보고 있는데 율장의 중요한 전문술어들이 나타나고 있다.
제13장「한 사람 품」(A1:13:1~7)
부처님의 존귀성을 일곱 가지 측면에서 고찰하고 있는 품이다.
제14장「으뜸 품」(A1:14:1~80)
본 품은 부처님 제자들 가운데 각 분야에서 으뜸가는 분 80명을 들고 있다. 본 품은 다시 7개의 부분으로 구성되어 있다. 이 가운데 첫 번째부터 네 번째까지는 각 방면에서 으뜸인 비구 47분들을 모은 품이고, 다섯 번째는 비구니 13분을, 여섯 번째는 청신사 10분을, 일곱 번째는 청신녀 10분을 모은 것이다. 이렇게 해서 각 방면에서 으뜸가는 80분의 부처님 제자들이 거명되고 있다. 물론 중복되어 나타나는 경우도 있는데 예를 들면 아난다 존자는 4-1~4-5까지 다문 제일, 마음챙김 제일, 총명 제일, 활력 제일, 시자들 중 으뜸으로 다섯 번이 언급되고 있다.
주석서는 이 80분의 으뜸가는 분들의 설명에 무려 335쪽을 할애하여 상세하게 설명을 하고 있다. 역자는 이를 참조해서 간략하게 주를 달아서 독자들의 이해를 도왔다.
제15장「불가능 품」(A1:15:1~28)
불가능한 일과 가능한 일, 즉 있을 수 없는 경우와 있을 수 있는 경우를 모두 한 경 안에 쌍으로 설하여서 모두 28가지 불가능한 일과 가능한 일을 들고 있다.
제16장「한 가지 법 품」(A1:16:1~10)
10가지 계속해서 생각함의 명상주제를 들고 있다.
제17장「씨앗 품」(A1:17:1~10)
본 품과 다음 품의 네 번째 경까지는 삿된 견해와 바른 견해를 중심으로 10가지를 살펴보고 있다.
제18장「막칼리 품」(A1:18:1~17)
본 품의 다섯 번째 경부터 마지막까지는 법과 율이 잘 설해진 경우와 법과 율이 잘못 설해진 경우에 생기는 현상들을 살펴보고 있다.
제19장「잠부 섬 품」(A1:19:1~2)
본 품은 순차적으로 수많은 중생들 가운데 법과 율을 만나서 법의 맛과 해탈의 맛을 아는 중생들이 적음을 설하고 있다.
제20장「손가락 튀기기의 연속 품」(A1:20:1~182)
손가락 튀기는 순간만큼이라도 본 품에 있는 182가지 법을 닦는 자라야 그를 일러 비구라 한다는 아주 귀중한 말씀들이 나열되고 있다. 특히 37보리분법과 8가지 지배와 8가지 해탈과 10가지 계속해서 생각함과 여러 가지 인식과 네 가지 禪과 사무량심 등의 명상주제들이 언급되고 있는 중요한 품이다.
제21장「몸에 대한 마음챙김 품」(A1:21:1~70)
본 품에서는 몸에 대한 마음챙김의 공덕을 70가지 측면에서 살펴보고 있다.
이처럼「하나의 모음」에 포함된 575개의 경들은 초기불교의 중요한 법수들, 특히 수행과 관계된 중요한 가르침들을 총망라하고 있다. 역자는 가급적이면 상세한 주해를 달려고 노력하였다.
3.「둘의 모음」
「둘의 모음」에는 283개의 경이 포함되어 있다. 각 경들의 주제가 둘에 관한 것이기 때문에「둘의 모음」에 실려 있는 대부분의 경들도 대부분 그 길이가 짧은 것들이다.「둘의 모음」은 모두 3개의 ‘50개 경들의 묶음(paṇṇāsaka)’으로 편집되어 있다. 그러나 한 묶음에 50개의 경만 포함되어 있는 것이 아니라 각각 50개의 경, 66개의 경, 167개의 경이 포함되어 있다. 이렇게 하여 모두 세 개의 경들의 묶음과 17개의 품들로 구성되어 있다.
그럼 각 묶음 별로 간단하게「둘의 모음」의 전체 구성을 살펴보자.
⑴「첫 번째 50개 경들의 묶음」
「첫 번째 50개 경들의 묶음」은 다음과 같이 다섯 개 품들로 구성되어 있다.
제1장「형벌 품」(A2:1:1~10)
제2장「대중공사[諍事] 품」(A2:2:1~10)
제3장「어리석은 자 품」(A2:3:1~10)
제4장「평등한 마음 품」(A2:4:1~10)
제5장「회중 품」(A2:5:1~10)
한 품에 열 개씩의 경들이 포함되어 있어서 전체적으로는 50개의 경들이 포함되어 있다. 첫 번째 경들의 묶음에는「둘의 모음」 가운데 비교적 긴 경들이 포함되어 있다. 그러나 각 품에 들어있는 경들은 서로 관련성이나 통일성을 발견하기 힘들다.
⑵「두 번째 50개 경들의 묶음」
「두 번째 50개 경들의 묶음」은 다음과 같이 다섯 개의 품들로 구성되어 있으며 모두 66개의 짧은 경들이 포함되어 있다.
제6장「사람 품」(A2:6:1~12)
제7장「행복 품」(A2:7:1~13)
제8장「표상 품」(A2:8:1~10)
제9장「법 품」(A2:9:1~11)
제10장「어리석은 자 품」(A2:10:1~20)
두 번째 묶음은 대부분 주제별로 잘 정리되어 있다. 제6장「사람 품」에는 사람들에 관계된 경들을 모았으며 특히 제7장「행복 품」의 13개의 경들은 다양한 행복들을 쌍으로 모아서 정리하고 있다. 제8장「표상 품」에 포함된 10개의 경들은 선법과 불선법이 일어나는 것은 그 표상, 동기, 원인, 의도적 행위, 조건, 물질, 느낌, 인식, 알음알이, 형성된 것이 있기 때문이라고 그 이유를 밝히고 있다. 제9장「법 품」은 쌍으로 된 법을 포함하는 11개의 경들로 이루어져 있다. 제10장「어리석은 자 품」은 어리석은 자에 해당하는 경우와 현명한 자에 해당하는 경우를 번갈아가며 다루는 경들 20가지로 구성되어 있다.
이처럼「두 번째 50개 경들의 묶음」은 서로 관련된 경들을 각 품에서 주제별로 잘 묶어 놓았다.
⑶「세 번째 50개 경들의 묶음」
「세 번째 50개 경들의 묶음」은 다음과 같다.
제11장「희망 품」(A2:11:1~12)
제12장「발원 품」(A2:12:1~11)
제13장「보시 품」(A2:13:1~10)
제14장「환영(歡迎) 품」(A2:14:1~12)
제15장「증득 품」(A2:15:1~17)
제16장「분노 품」(A2:16:1~100)
제17장「율 등의 품」(A2:17:1~5)
이것은 7개의 품들로 구성되어 있으며 모두 167개의 짧은 경들이 포함되어 있다. 특히 제16장「분노 품」에는 100개의 경들이「하나의 모음」(A1)의 제20장「손가락 튀기기의 연속 품」(A1:20:1~182)에서처럼 반복해서 나열되고 있다.
이 가운데 제13장「보시 품」은 보시나 관대함과 같은 남에 대해서 가지는 호의적이고 좋은 법수들로 구성된 경들 10개를 모은 것이다. 그러나 전체적으로는 서로 유사하거나 서로 반대가 되는 법수들을 간략하게 나열하고 있는 아주 짧은 경들 167개로 구성되어 있어서 일종의 잡다한 경들의 묶음의 성격이 강하다.
4.「둘의 모음」에서 관심을 가져야 할 경들
「둘의 모음」에서 우리가 꼭 주목해야 할 경들을 몇 가지 살펴보도록 하자.
⑴「뜻을 알아내어야 함 경」1/2(A2:3:5~6)
세존께서는 45년 동안 여러 부류의 사람들에게 아주 다양하게 많은 가르침을 주셨다. 우리는 그것을 대기설법(對機說法, pariyāya-desana)이라 부른다. 듣는 사람의 처한 상황이나 문제의식이나 이해 정도나 수행 정도나 기질이나 성향에 따라서 다양한 방법을 동원해서 설법을 하셨다는 말이다. 그러다보니 자기 깜냥만큼 부처님 말씀을 이해하여 세존의 근본 가르침과는 다르게 의미를 해석하는 경우가 발생하게 되었다. 그런 자들을 두고 세존께서는 본경을 말씀하신 것이다. 세존께서는 본경에서 다음과 같이 말씀하신다.
“비구들이여, 두 부류의 사람은 여래를 사실과 다르게 이야기 한다. 어떤 것이 둘인가?
[숨은] 뜻을 알아내어야 할 가르침에 대해서 이미 [그 뜻이] 확정된 가르침이라고 하는 자와 [이미 그 뜻이] 확정된 가르침에 대해서 [숨은] 뜻을 알아내어야 할 가르침이라고 말하는 자이다. 비구들이여, 이러한 두 부류의 사람은 여래를 사실과 다르게 이야기 한다.”
숨은 뜻을 알아내어야 할 가르침에 대해서 이미 그 뜻이 확정된 가르침이라고 하는 자에 대해서 주석서는 이렇게 설명하고 있다.
“예를 들면 ‘비구들이여, 한 사람, 두 사람, 세 사람, 네 사람이 있다.’라는 가르침은 그 ‘[숨은 뜻을] 알아내어야 하는 가르침(neyyattha suttanta)’이다. 왜냐하면 비록 정등각께서 ‘한 사람이 있다.’라는 식으로 말씀을 하셨더라도 ‘궁극적 의미에서는 사람(puggala)이라는 [개념은] 존재하지 않는다.’고 그 숨은 뜻을 알아내어야 하기 때문이다. 그러나 어리석은 자는 이런 가르침을 두고 ‘이미 그 뜻이 확정된 가르침(nītattha suttanta)’이라고 우긴다. ‘만약 궁극적 의미에서 사람이라는 것이 존재하지 않는다면 세존께서 ‘비구들이여, 한 사람이 있다.’라는 식으로 설하지 않으셨을 것이다. 그러나 이미 세존께서 그렇게 설하셨기 때문에 궁극적 의미에서 사람이라는 것이 존재한다.’고 잘못 이해하면서 숨은 뜻을 알아내어야 할 가르침에 대해서 이미 그 뜻이 확정된 가르침이라고 우긴다.”(AA.ii.118)
그리고 이미 그 뜻이 확정된 가르침에 대해서 숨은 뜻을 알아내어야 할 가르침이라고 말하는 자에 대해서 주석서는 이렇게 설명하고 있다.
“예를 들면 ‘무상이요 괴로움이요 무아다.’라는 말씀이 있다. 여기서 오직 무상이요 오직 괴로움이요 오직 무아라는 것이 그 뜻이다. 그러나 자신의 어리석음 때문에 ‘이것은 [숨은 뜻을] 알아내어야 할 가르침이다. 나는 그 뜻을 밝힐 것이다.’라고 하면서 ‘참으로 항상한 것이 있다. 참으로 행복이 있다. 참으로 자아가 있다.’라고 거머쥐면서 [이미 그 뜻이] 확정된 가르침에 대해서 [숨은 뜻을] 알아내어야 할 가르침이라고 우기는 것이다.”(Ibid)
우리 주위에도 잘못된 견해를 가진 이런 사람을 종종 만난다. ‘부처님은 브라흐마가 된다고 말씀하셨다. 그러므로 부처님은 범아일여를 말씀하셨다. 그리고 부처님은 초기경 도처에서 참된 사람(참사람, 眞人)을 말씀하셨다. 그러므로 자아나 개아는 실재한다. 그리고 부처님은 본자청정 객진번뇌를 말씀하셨다. 그러므로 마음은 영원하다.’라고. 이런 사람은 특히 이 말씀을 잘 음미해볼 필요가 있으리라.
⑵「영지(靈知)의 일부 경」(A2:3:10)
초기경의 여러 곳에서 사마타와 위빳사나라는 술어가 나타난다. 그러나 무엇이 사마타고 무엇이 위빳사나인지를 설명하신 경은 드물다. 그런 의미에서 사마타와 위빳사나를 정의하고 있는 본경은 아주 중요하다. 본경에서 세존께서는 말씀하신다.
“비구들이여, 사마타를 닦으면 어떤 이로움을 경험하는가? 마음이 개발된다. 마음이 개발되면 어떤 이로움을 경험하는가? 욕망(rāga)이 제거된다.
비구들이여, 위빳사나를 닦으면 어떤 이로움을 경험하는가? 통찰지가 개발된다. 통찰지가 개발되면 어떤 이로움을 경험하는가? 무명이 제거된다.
탐욕에 오염된 마음은 해탈하지 못하고 무명에 오염된 통찰지는 개발되지 못한다. 비구들이여, 탐욕이 제거되어 마음의 해탈[心解脫]이 있고, 무명이 제거되어 통찰지를 통한 해탈[慧解脫]이 있다.”
이처럼 본경에서 부처님께서는 분명히 사마타를 마음과 마음의 해탈(심해탈) 즉 삼매[定, 사마디]와 연결 지으시고 위빳사나를 통찰지와 통찰지를 통한 해탈(혜해탈) 즉 통찰지[慧, 빤냐]와 연결 지으신다. 그리고 삼매는 욕망을 극복하는 수행이고 통찰지는 무명을 극복하는 수행이라고 밝히신다.
그리고 본서 제2권의「삼매 경」1/2/3(A4:92~94)도 사마타 수행과 위빳사나 수행에 대한 귀중한 말씀을 하신다. 본서 제2권의 해제 §5의 ⑹과 ⑺을 참조할 것.
⑶「무슨 교설 경」(A2:4:3)
어떤 바라문이 세존께 와서 “고따마 존자시여, 당신은 어떤 교설을 가졌으며 무엇을 말씀하십니까?”라고 질문을 드리자 세존께서는 이렇게 대답하신다.
“바라문이여, 나는 지음에 대한 교설과 짓지 않음에 대한 교설을 가르친다.”
여기서 ‘지음에 대한 교설’과 ‘짓지 않음에 대한 교설’로 옮긴 원어는 각각 kiriya-vāda와 akiriya-vāda이다. 이 두 술어는 일반적으로 각각 업지음에 대한 교설과 업을 짓지 않음에 대한 교설로 옮겨진다. 전자는 도덕적 행위를 긍정하는 도덕긍정론이고 후자는 도덕적 행위를 부정하는 도덕부정론이다. 도덕부정론자로는 뿌라나 깟사빠와 막칼리 고살라 등이 잘 알려져 있다. 그래서 본서「하나의 모음」「막칼리 품」(A1:18)의 네 번째 경에서 세존께서는 막칼리 고살라를 엄하게 나무라신다. 그러나 본경을 잘못 이해하면 부처님께서는 도덕긍정도 가르치시고 도덕의 부정도 가르치시는 것처럼 잘못 이해할 수가 있다.
그러나 본경에서는 이런 양 극단에 해당하는 두 술어를 사용하여 부처님 교설의 특징을 분명하게 드러내 보이고 있다. 그래서 본경에서는 이 두 술어를 도덕긍정론과 도덕부정론의 의미로 옮기지 않고 문자적인 의미를 존중하여 각각 ‘지음에 대한 교설’과 ‘짓지 않음에 대한 교설’로 옮겼다. 본경에서 세존께서는 말씀하신다.
“바라문이여, 나는 짓지 않음에 대한 교설을 가르친다. 몸으로 나쁜 행위를 저지르고 말로 나쁜 행위를 저지르고 마음으로 나쁜 행위를 저지르는 자에게 여러 가지 나쁜 불선법들을 짓지 말 것을 가르친다.
바라문이여, 나는 지음에 대한 교설을 가르친다. 몸으로 좋은 행위를 하고 말로 좋은 행위를 하고 마음으로 좋은 행위를 하는 자에게 여러 가지 선법들을 지을 것을 가르친다.
바라문이여, 나는 이와 같이 지음에 대한 교설과 짓지 않음에 대한 교설을 가르친다.”
⑷「족쇄 경」(A2:4:5)
본경은 사리뿟따 존자가 안의 족쇄에 채인 자와 밖의 족쇄에 채인 자를 멋지게 설명하고 있는 경이다. 본경에서 존자는 금생에 계를 잘 지니고 수행하지만 죽어서 다시 인간으로 태어나는 자를 안의 족쇄에 채인 자라 설명하고, 금생에 계를 잘 지니고 수행하지만 죽어서 여러 천상의 신으로 태어나는 자를 밖의 족쇄에 채인 자라고 설명하고 있다. 아무리 수승한 경지의 신들일지라도 그들은 모두 족쇄에 채인 자들일 뿐이라는 사리뿟따 존자의 사자후이다.
존자의 이러한 대사자후를 들은 신들이 환희심이 생겨서 세존께 가서 그 사실을 말씀드리고 세존께서는 그곳으로 가셔서 “사리뿟따여, 외도들은 이 교법을 듣지 못하여 파멸한다.”고 하시면서 그의 설법을 크게 인정하고 계시는 경이다.
5.「셋의 모음」
「셋의 모음」에는 모두 163개의 경들이 포함되어 있다.「셋의 모음」에는 우리에게 잘 알려진 경들도 포함되어 있고 그 길이가 장부에 넣어도 될 만큼 긴 경도 포함되어 있다.
그래서 PTS본에서도「셋의 모음」부터 경의 번호를 I.x.8이나 II.v.4 등으로 품의 번호에 따라서 매기지 않고 처음부터 끝까지 III.1부터 III.163까지 일련번호로 매기고 있다. 이러한 방법은「셋의 모음」부터「열하나의 모음」까지 나머지 모음 전체에 다 적용시키고 있다. 그래서 역자도「셋의 모음」부터는 경의 번호를 A3:1부터 A3:163까지로 매기고 있다.
그럼 각 묶음 별로 간단하게「셋의 모음」의 전체 구성을 살펴보자.
⑴「첫 번째 50개 경들의 묶음」
「첫 번째 50개 경들의 묶음」은 제1장「어리석은 자 품」, 제2장「마차공 품」, 제3장「사람 품」, 제4장「저승사자 품」, 제5장「소품」까지 모두 다섯 품으로 구성되어 있으며 각 품에 10개씩의 경들이 포함되어 모두 50개의 경들이 수록되어 있다.「둘의 모음」에 비하면 상당히 긴 경들이고 각 주제에 대해서 심도 깊은 논의를 하고 있는 경들이 많다.
⑵「큰 50개 경들의 묶음」
「큰 50개 경들의 묶음」이라는 제목이 보여주듯이「셋의 모음」 가운데 가장 긴 경들로 구성되어 있다. 본 묶음에는 제6장「바라문 품」, 제7장「대품」, 제8장「아난다 품」, 제9장「사문 품」, 제10장「소금 덩이 품」까지 모두 다섯 품으로 구성되어 있으며 각 품에 10개씩의 경들이 포함되어 모두 50개의 경들이 수록되어 있다.
여기에 나타나는 경들은 대부분이『맛지마 니까야』에 포함되어 있는 경들 정도의 길이가 되는 것들로 이루어져 있고 이 가운데서도 다시 제7장「대품」의 경들의 길이는 더욱 길다. 그 가운데서도「팔관재계경」(A3:70)은『디가 니까야』의 웬만한 경들에 필적하는 길이이다.
본 묶음에 포함되어 있는 경들은 그 길이가 긴만큼 각 주제에 대해서 자세하고 심도 깊은 설법을 포함하고 있는 경들이 대부분이다. 그 가운데서도「웨나가뿌라 경」(A3:63)과「깔라마 경」(A3:65)과「팔관재계 경」(A3:70) 등은 주목할 만하다. 그리고 제8장「아난다 품」에 포함되어 있는 여러 경들은 아난다 존자와 여러 사람들의 대화를 기록한 경들이라서 관심이 가는 부분이다. 특히 아난다 존자가 세존께 여쭙고 세존이 대답하신「아비부 경」(A3:80)에는 소천세계, 중천세계, 삼천대천세계의 설명이 상세하게 나타난다. 그리고「소금 덩이 경」(A4:99)도 업에 대한 과보가 왜 다르고 다양한지를 이해할 수 있는 좋은 경이다.「불순물 제거하는 자 경」(A3:100)도 주목할 만하다. 자세한 것은 아래의 관심을 가져야 할 경들 부분을 참조하기 바란다.
⑶「작은 50개 경들의 묶음」
본 묶음에는 제11장「바른 깨달음 품」, 제12장「악처로 향하는 자 품」, 제13장「꾸시나라 품」, 제14장「무사 품」, 제15장「길상 품」, 제16장「나체수행자 품」까지 모두 6개의 품이 포함되어 있다. 제15장까지는 각 품에 10개의 경들이 포함되어 있고 제16장에는 13개의 경들이 포함되어서 모두 63개의 경들이 여기에 포함되어 있다.「첫 번째 50개 경들의 묶음」에 포함된 경들 정도의 길이로 된 경들이 대부분이다.
전체적으로 볼 때「셋의 모음」에 포함된 경들 가운데 긴 경들을「큰 50개 경들의 묶음」으로 모아서 편집하였으며 그 가운데서도 더 긴 것들은「대품」으로 모았다. 그리고 법수만 나열하고 있는 짧은 경들을 본「작은 50개 경들의 묶음」으로 모았다.
6.「셋의 모음」에 나타나는 주제들
「셋의 모음」에는 다양한 주제들이 포함되어 있지만 그 가운데서도 특히 많이 나타나고 있는 주제들을 살펴볼 필요가 있다.
먼저 업(業, kamma) 특히 신․구․의 삼업에 관계된 경들을 들 수 있다.「셋의 모음」에 포함되어 있는 163개 경들 가운데 34개 정도의 많은 경들이 업을 주제로 하고 있다. 그것도 대부분 몸과 말과 마음[身․口․意]으로 짓는 삼업(三業)을 기본 주제로 삼고 있다. 인간은 몸을 문으로 하고 말을 문으로 하고 마음을 문으로 하여 다양한 업을 짓고 이러한 업의 과보에 계박되어서 선처와 악처로 생사윤회를 거듭한다.「셋의 모음」에는 이러한 삼업에 관련된 가르침이 가장 많이 모아져 있다.
그리고 셋에 관한 부처님의 가르침 가운데는 우리에게 삼독(三毒)으로 잘 알려진 탐욕․성냄․어리석음[貪․瞋․癡]에 관한 것이 많다. 그래서「셋의 모음」에서도「원인 경」(A3:33)과「왓지의 후예 경」(A3:83) 등 대략 17개 정도의 경들은 탐욕, 성냄, 어리석음의 세 가지를 주제로 하고 있다.
셋에 관한 부처님 말씀 가운데는 계와 삼매와 통찰지[戒․定․慧]의 삼학(三學)이 들어있다. 계․정․혜 삼학은『디가 니까야 』제1권의 13개의 경들 가운데 10개 정도 긴 경들의 주제이기도 하다. 본서의「셋의 모음」에서도 이러한 삼학을 주제로 하고 있는 경이 대략 10개 정도 나타나고 있다.
「셋의 모음」에는 사람들을 세 가지 부류로 나누어서 설명하는 경들이 다수 나타난다. 제3장「사람 품」의 10개의 경들을 포함한 14개 정도의 경들은 세 부류의 사람을 여러 측면에서 분류하고 있다. 그리고 제1장「어리석은 자 품」에 포함된「특징 경」(A3:2)부터「나쁜 행위 경」(A3:9)까지 8개의 경들은 어리석은 자와 현명한 자의 특질을 각각 세 가지씩을 들면서 비교해서 설명하고 있는데 이러한 경들도 결국은 사람을 설하시는 경으로 분류할 수 있겠다.
부처님은 인간을 길들이는 분(조어장부)이라 불리는 분이다. 인간을 분류하고 있는 이러한 경들은 조어장부로서의 세존의 진면목을 유감없이 드러내고 있다. 여기에 대해서는 본서 제2권 해제 §4 등을 참조하기 바란다.
그러나 셋에 관계된 중요한 가르침인 무상․고․무아의 삼특상(ti- lakkhaṇa)을 주제로 한 경들은「셋의 모음」에서는 찾아보기 힘들다. 이 삼특상은 유위법의 보편적인 성질[共相, sāmañña-lakkhaṇa]인데『상윳따 니까야』의「온 상응」(Khandha-saṁyutta, S22)이나「육처 상응」(Saḷāyatana-saṁyutta, S35) 등에서 무더기․감각장소․요소[蘊․處․界]의 보편적 성질로 아주 많이 나타나고 있기 때문에 본서의「셋의 모음」에서는 무상․고․무아를 기본주제로 한 경들로 묶어내지는 않은 것으로 보인다.
그리고 셋에 관계된 중요한 법수인 불․법․승 삼보를 주제로 한 경들도 나타나지 않는데 이것은 다른 니까야의 경우도 마찬가지이다.
7.「셋의 모음」에서 관심을 가져야 할 경들
우선「셋의 모음」 제7장「대품」의 경들을 주목해야 할 필요가 있을 것 같다.「대품」이라는 명칭이 보여주듯이「셋의 모음」 가운데서 가장 긴 경들이 여기에 포함되어 있으며 긴만큼 심도 깊은 논의가 진행되기 때문이다.
⑴「깔라마 경」(A3:65)
세상에는 서로 다른 여러 종교가 있고 서로 다른 여러 철학이 있고 서로 다른 여러 계율 규범이나 생활 규범이 있고 또 서로 다른 여러 관습이 있다. 세상에 태어나서 하나의 종교나 철학이나 규범이나 관습만을 평생 접하고 산다면 어쩌면 인간에게 큰 혼란이 없을 수도 있을 것이다.(물론 더 큰 미망에 빠져 지낼 가능성도 배제할 수는 없지만 말이다.) 그러나 인터넷이나 미디어나 고도로 발달된 교통수단과 통신수단의 영향 하에 살아가야 하는 현대인들은 다양한 종교, 다양한 철학, 다양한 규범, 다양한 관습을 접할 수밖에 없다. 그러면 이러한 다양한 체계를 접하여 그것을 받아들이고 거부하는 가장 중요한 척도는 무엇일까? 무엇에 근거해서 어떤 체계는 받아들여야 하고 무엇에 바탕해서 어떤 체계는 거부해야 하는 것일까?
이것을 설명하고 있는 것이 바로「깔라마 경」이다. 이런 의미에서「셋의 모음」에서 가장 잘 알려진 경은 뭐라 해도「깔라마 경」일 것이다. 다양한 종교인들이 서로 극단적으로 다른 가르침을 설하자 그것을 접하여 혼란스러웠던 께사뿟따의 깔라마 인들은 세존께서 그들의 마을에 도착하시자 바로 이러한 문제를 단도직입적으로 제기하고 있다.
여기에 대해서 세존께서는 이렇게 분명하게 말씀하신다.
“소문으로 들었다 해서, 대대로 전승되어 온다고 해서, ‘그렇다 하더라.’고 해서, [우리의] 성전에 써 있다고 해서, 논리적이라고 해서, 추론에 의해서, 이유가 적절하다고 해서, 우리가 사색하여 얻은 견해와 일치한다고 해서, 유력한 사람이 한 말이라 해서, 혹은 ‘이 사문은 우리의 스승이시다.’라는 생각 때문에 그대로 따르지는 말라. 깔라마들이여, 그대들은 참으로 스스로가 ‘이러한 법들은 해로운 것이고, 이러한 법들은 비난받아 마땅하고, 이런 법들은 지자들의 비난을 받을 것이고, 이러한 법들을 많이 받들어 행하면 손해와 괴로움이 있게 된다.’라고 알게 되면 그때 그것들을 버리도록 하라.”
이렇게 말씀하신 뒤에 하나하나 문답을 통해서 어떤 가르침이 나의 탐욕과 성냄과 어리석음을 증장시키는가 감소시키는가를 가지고 그 가르침을 판단하라고 말씀하신다. 어떤 가르침을 듣고 그대로 행해서 나의 탐욕이나 성냄이나 어리석음이 증장한다면 그 가르침은 따르지 말라고 하시고 반대로 해소가 된다면 그런 가르침은 따르라는 말씀이시다.
그리고 마지막으로 세존께서는 이렇게 실천하는 사람에게는 네 가지 위안이 있다고 말씀하신다. 세존의 말씀을 인용해본다.
“만약 다음 세상이 있고, 선행과 악행의 업들에 대한 결실과 과보가 있다면 나는 몸이 무너져 죽은 뒤 좋은 곳[善處], 천상세계에 태어날 것이다.
만약 다음 세상도 없고 선행과 악행의 업들에 대한 결실과 과보도 없다면 나는 금생에 원한 없고 악의 없고 고통 없이 행복하게 살 것이다.
만약 어떤 이가 행하면서 나쁜 행을 하더라도 내가 다른 이에게 악을 저지르도록 교사하지 않았고 내 스스로도 악업을 짓지 않았거늘 어떻게 내가 고통과 마주치겠는가?
만약 어떤 이가 행하면서 나쁜 행을 하지 않으면 나는 양면으로 청정한 나를 볼 것이다.”
네 번째 위안에 대해서 주석서는 이렇게 설명한다. “양면으로 청정하다는 것은 내가 악을 저지르지 않고 또 어떤 이가 행하면서 악을 행하지 않기 때문에 양면으로 청정하다.”(AA.ii.306)
한편 이러한 세존의 가르침은 본서 제2권「밧디야 경」(A4:193)에도 나타나는데 세존의 이러한 말씀을 들은 밧디야는 이것이야말로 최고의 ‘개종시키는 요술’이라고 경탄해마지 않는다.
⑵「몸으로 체험한 자 경」(A3:21)
해탈은 어떻게 이루어지는가? 해탈을 성취하기 위한 가장 중요한 바탕은 무엇인가? 왜 다 같이 해탈한 사람인데 그 경지는 다른 듯이 보이고 성향도 다른 듯이 보이는가? 그 이유는 무엇인가?
여기에 대한 답이 본경에 들어있다. 본경은 이런 문제를 두고 사윗타 존자와 마하꼿팃따 존자와 사리뿟따 존자의 대화로 구성되어 있다. 본경에서는 해탈한 사람 가운데 세 부류인 몸으로 체험한 자, 견해를 얻은 자, 신심으로 해탈한 자를 든 뒤에 첫 번째는 삼매와, 두 번째는 통찰지와, 세 번째는 믿음(초기경에서 믿음은 항상 계와 연결이 되고 있다)과 연결 지으신다.
이처럼 본경은 수행에 있어서 믿음과 삼매와 통찰지 즉 계․정․혜의 역할을 잘 보여주고 있으며 사윗타 존자와 마하꼿팃따 존자와 사리뿟따 존자는 각각 신심으로 해탈한 분, 몸으로 체험하여 해탈한 분, 견해를 얻음을 통해서 해탈한 분이었음을 알 수 있으며 그래서 각각 믿음과 삼매와 통찰지의 기능이 강한 분들이었음을 알 수 있다.
본경이 중요한 이유는 개인의 기질이나 성향에 따라서 믿음이 더 강하기도 하고, 삼매나 선정이 더 강하기도 하고, 통찰지나 위빳사나가 더 강하기도 하다는 것을 보여주기 때문이다. 그런 것이지 모든 사람들에게 천편일률적으로 적용되는 가르침이란 이론적으로는 가능할지 모르나 현실적으로는 존재하지 않는다. 그래서 세존께서도 본경에서 “이러한 세 부류의 사람들 가운데 누가 가장 훌륭하고 고결한지를 결정적으로 말하는 것은 쉬운 일이 아니다.”라고 말씀하신다. 그러나 어떤 경우에도 사성제를 통찰하지 못하면 그것은 깨달음이라 할 수 없다.
⑶「거꾸로 놓은 항아리 경」(A3:30)
본경은 통찰지를 토대로 하여 불자들을 “통찰지가 거꾸로 놓인 항아리와 같은 사람, 통찰지가 허리에 달린 주머니와 같은 사람, 통찰지가 큰 사람”의 셋으로 분류하고 있다.
첫 번째 유형의 불자는 지속적으로 절에 가지만 법을 들을 때도, 듣고 집으로 돌아왔을 때도 그 가르침을 전혀 음미하지 않고 이해하지 못하는 경우이다. 이는 거꾸로 놓인 항아리에 물을 붓는 것과 같은 것이다. 두 번째 유형의 불자는 절에 가서 법을 들을 때는 잘 이해하지만 집에 돌아가면 다 잊어버리고 실천하지 않는 자이다. 이런 불자는 허리에 달린 주머니에 맛있는 사탕 등을 잔뜩 넣었지만 일어나면서 주머니에 사탕이 든 줄을 잊어버려서 쏟아버리는 것과 같다. 세 번째 유형의 불자는 들을 때도 잘 이해하고 집에 가서도 잘 실천하는 자이다. 이런 불자는 바로 놓인 항아리에 물을 붓는 것과 같이 통찰지가 큰 사람이다.
본경은 제자들로 하여금 자신은 이 셋 가운데 어떤 부류의 불자인지 스스로를 점검하도록 하는 가르침이다.
⑷「알라와까 경」(A3:34)
세존께서 알라위에서 고막가에 있는 심사빠 숲 속에 떨어진 나뭇잎 더미 위에 머무시는 것을 보고 핫타까 왕자가 세존께 “세존이시여, 안녕히 주무셨습니까?”라고 안부를 묻자 세존께서 핫타까에게 말씀하신 경이다.
세존께서는 탐욕으로 인한 육체적인 열기와 정신적인 열기가 생겨 그러한 탐욕에서 생긴 열기로 불탈 때 그는 잠을 제대로 이루지 못할 것이며 그렇다면 호화로운 저택과 잠자리도 행복을 가져다주지 못한다고 말씀하신다. 그러나 이러한 탐욕의 열기가 가라앉은 사람에게는 머무는 모든 곳이 훌륭한 집이요 좋은 잠자리라고 강조하신다. 수행자에게는 탐욕과 성냄과 어리석음을 해소하는 것이 중요하지 머무는 거처가 중요한 것은 아니라는 것을 일깨워주시는 가르침이다.
⑸「유행승 경」(A3:54)과「열반 경」(A3:55)
이 두 경들은 각각 법과 열반은 “스스로 보아 알 수 있고, 시간이 걸리지 않고, 와서 보라는 것이고, 향상으로 인도하고, 지자들이 각자 알아야 하는 것이다.”라는 부처님 말씀의 의미에 대한 설명을 담고 있는 가르침이다.
탐욕과 성냄과 어리석음에 빠진 사람은 자기와 타인을 해치는 생각을 하고 육체적 고통과 정신적 고통을 경험하며, 몸과 말과 마음으로 나쁜 행위를 저지르며, 자기와 타인에게 이로운 것을 있는 그대로 꿰뚫어 알지 못한다. 그러나 탐욕과 성냄과 어리석음에 빠지지 않은 사람은 이와는 반대이다.
이처럼 탐욕과 성냄과 어리석음이 다함은 스스로 보아 알 수 있고, 시간이 걸리지 않고, 와서 보라는 것이고, 향상으로 인도하고, 지자들이 각자 알아야 하는 것이라고 선언하시며 이것을「유행승 경」에서는 법으로 표현하고 있고「열반 경」에서는 열반으로 설명하고 있다. 참으로 부처님 법은 탐․진․치의 소멸을 근본으로 하며 이러한 탐․진․치가 소멸된 경지가 바로 열반이다.
⑹「외도의 주장 경」(A3:61)
본경에서 부처님께서는 외도의 주장을 다음과 같이 크게 셋으로 정리하고 계신다.
첫째는 ‘모든 것은 전생의 행위에 기인한다.’는 것이고, 둘째는 ‘모든 것은 신이 창조했기 때문이다.’는 것이고, 셋째는 ‘어떤 것에도 원인도 없고 조건도 없다.’는 것이다.
이것은 지금도 대부분의 인류가 가지고 있는 대표적인 세 종류의 믿음이다. 모든 것을 전생의 탓으로 돌리는 것은 일종의 운명론이며 힌두교가 대표적이다. 모든 것을 신의 피조물로 여기는 것도 일종의 운명론이며 기독교가 대표적이다. 원인도 조건도 없다는 것은 도덕부정론이며 유물론적인 사고방식이다.
부처님께서는 이러한 사고방식을 위험하다고 지적하신다. 왜? 이러한 사상에 물들게 되면 스스로의 향상을 위한 노력을 포기해버리기 때문이다. 그래서 방일하게 되고 모든 것을 운명이나 남의 탓으로 돌리게 되기 때문이다. 그래서 세존께서는 이렇게 정리하신다.
“[이러한 셋을] 진심으로 믿는 자들에게는 해야 할 것과 하지 말아야 할 것에 대해 [하려는] 열의와 노력과 [하지 않으려는] 열의와 노력이 없다. 해야 할 것과 하지 말아야 할 것에 대해 진실함과 확고함을 얻지 못하고 마음챙김을 놓아버리고 [여섯 가지 감각기능의 문을] 보호하지 않고 머물기 때문에 그들은 자기들 스스로 정당하게 사문이라고 주장하지 못한다.”
이렇게 말씀하신 뒤 세존께서는 여섯 가지 요소[界], 여섯 가지 감각접촉의 장소[處], 18가지 마음의 움직임, 네 가지 성스러운 진리[四聖諦]를 말씀하신 뒤 “내가 설한 이러한 법들은 현명한 사문․바라문들에게 논박될 수 없고 오염될 수 없고 비난받지 않고 책망듣지 않는다.”고 선언하신다. 그리고 이들을 연기법적인 고찰을 바탕으로 자세하게 설명하신다. 본경은 외도의 가르침에 대비되는 부처님 가르침의 특징을 잘 드러내는 경이다.
⑺「웨나가뿌라 경」(A3:63)
본경은 웨나가뿌라의 바라문 장자들이 세존께 와서 “고따마 존자께서는 여러 종류의 높고 넓은 침상들을 원하기만 하면 얻을 수 있고 어려움 없이 얻을 수 있고 많이 얻을 수 있지 않습니까?”라고 말씀드리자 세존께서 대답하시는 경이다.
그들의 물음에 대해서 세존께서는 세 종류의 넓고 높은 침상에 대해 말씀하신다. 즉 천상의 넓고 높은 침상과 범천의 넓고 높은 침상과 성자(ariya)의 넓고 높은 침상이다. “나는 지금 바로 그것을 원하기만 하면 얻을 수 있고 어려움 없이 얻을 수 있고 많이 얻을 수 있다.”고 대답하신다. 그런 뒤에 수행자에게 있어서 세 가지의 높고 넓은 침상이란 바로 네 가지 선[四禪], 네 가지 거룩한 마음가짐[四梵住], 탐․진․치의 멸절이라고 설명하고 계신다.
본경에는 수행자가 사용하고 머물러야 할 곳은 호화로운 침상이나 저택이 아니라 선정과 거룩한 마음가짐과 탐․진․치의 해소라는 세존의 가르침이 담겨있다.
⑻「팔관재계 경」(A3:70)
본경은「셋의 모음」 가운데서 가장 긴 경이다. 미가라마따(녹자모) 위사카가 포살일에 승원에 오자 세존께서 그녀에게 설하신 가르침인데 특히 재가신도가 지켜야 할 포살과 8계를 설명하고 있는 중요한 경이다.
본경에서 세존께서는 포살을 목동의 포살, 니간타의 포살, 성자의 포살로 상세하게 설명하신다. 포살을 준수하면서 내일은 맛있는 것을 먹어야지 하는 등의 생각에 빠져 있는 자는 마치 목동이 내일은 소들을 어디어디에서 방목하고 물을 먹여야지 하는 생각으로 밤을 지새는 것과 같으며 이것을 목동의 포살이라 한다.
니간타의 제자들은 포살일에 무소유를 선언하더라도 포살이 끝나면 다시 이전대로 모든 것을 소유하게 된다. 그러므로 포살일에만 무소유를 선언하는 것은 거짓말을 하는 것이며 이러한 것을 니간타의 포살이라 한다.
이렇게 설명하신 뒤에 성자들의 포살 즉 불자가 지키는 포살을 상세하게 설명하신다. 요약하자면 불자는 포살일에 불․법․승․계․천신을 계속해서 생각하면서 오염된 마음을 바른 방법으로 청정하게 한다. 그리고 포살일에는 재가자도 아라한의 삶의 기본이 되는 여덟 가지 계를 지키는 것으로 성자들의 포살을 설명하신다. 여덟 가지 계는 다음과 같다.
① 생명을 죽이지 않는다.
② 주지 않은 것을 가지지 않는다.
③ 성행위를 하지 않는다.
④ 거짓말을 하지 않는다.
⑤ 방일하는 근본이 되는 술과 중독성 물질을 섭취하지 않는다.
⑥ 하루 한 끼만 먹는다.
⑦ 춤, 노래, 음악, 연극을 관람하지 않고 화환을 두르고 향과 화장품을 바르고 장신구로 꾸미는 것을 하지 않는다.
⑧ 높고 큰 침상을 사용하지 않는다.
⑼「아비부 경」(A3:80)
아난다 존자가 세존께 여쭙고 세존이 대답하신「아비부 경」에는 소천세계, 중천세계, 삼천대천세계의 설명이 상세하게 나타나는데 이러한 가르침은 4부 니까야에서는 이곳에 밖에 나타나지 않는 가르침인 듯하다. 그리고 전체 초기경들 가운데서도『의석』(義釋, Niddesa)을 제외하고는 이곳 밖에 나타나지 않는 것으로 보인다. 그러므로 본경은 주석서나 부파불교와 특히 대승불교에서 전개하고 있는 우주관의 출발이 되는 경이라 할 수 있다.
하나의 세계는 각각 하나씩의 달과 태양과 산의 왕인 수미산과 잠부디빠와 아빠라고야나와 웃따라꾸루와 뿝바위데하와 큰 바다와 사대왕천과 삼십삼천과 야마천과 도솔천과 자재천과 타화자재천과 범천이 있다. 이러한 세계가 1000이 모인 것을 소천세계라 하고 이러한 소천세계가 1000이 모인 것을 중천세계라 하고 이러한 중천세계가 1000이 모인 것을 삼천대천세계라 한다. 즉 중천세계에는 모두 100만의 세계가 있고 삼천대천세계에는 모두 10억의 세계가 있는 셈이다.
⑽「마하나마 경」(A3:73)
본경은 삼매가 먼저냐 통찰지가 먼저냐를 묻고 있는 관심을 끄는 경이다.
삭까족 마하나마가 세존께 “세존이시여, 그러면 삼매가 먼저 있고 지혜가 뒤에 있습니까? 아니면 지혜가 먼저 있고 삼매가 뒤에 있습니까?”라고 묻고 세존이 병환에서 회복하신지 얼마 지나지 않았기 때문에 아난다 존자가 이에 대답하는 경이다.
마하나마가 삼매[定]가 먼저냐 통찰지[慧]가 먼저냐고 질문한데 대해서 아난다 존자는 이 둘의 선후를 대답하는 대신 유학의 삼매와 통찰지는 무학의 삼매와 통찰지보다 먼저인 것이 분명하지만 같은 유학 안에서나 같은 무학 안에서 정과 혜는 선후를 말할 수 없다고 대답하고 있다. 그래서 복주서는 “먼저 유학의 계․정․혜를 설하고 뒤에 무학의 계 등을 설하면서 이 뜻을 드러내는 것이다.”(AAṬ.ii.164)라고만 간략하게 설명하고 있다.
그리고 삼매가 먼저냐 통찰지가 먼저냐 혹은 사마타가 먼저냐 위빳사나가 먼저냐에 대한 답은 오히려 본서 제2권「삼매 경」1/2/3(A4:92~94)의 세 개의 경에 있다고 본다. 이 경들을 통해서 살펴보면 삼매가 먼저냐 통찰지가 먼저냐 하는 것은 수행자 개인의 기질이나 성향에 달린 것이지 무엇이 먼저라고는 말할 수 없다는 것이 분명하다. 여기에 대해서는 제2권 해제 §5의 ⑺과「삼매 경」1/2/3(A4:92~94)과「쌍 경」(A4:170)을 참조할 것.
⑾「사문 경」(A3:81)
출가란 말 그대로 집을 떠나는 행위이다. 집을 떠난다 함은 집으로 표현되는 세상의 모든 의무나 권리나 욕망이나 희망을 모두 접는다는 뜻이다. 그러면 이러한 세속의 모든 의무나 권리나 욕망이나 희망을 접고 출가를 한 자는 무엇을 해야 하는가? 본경은 이것을 분명하게 밝히고 있다.
본경에서 세존께서는 비구들에게 출가자가 해야 할 일은 높은 계를 공부짓고[增上戒學, adhisīla-sikkhā] 높은 마음을 공부짓고[增上心學, adhi- citta-sikkhā] 높은 통찰지를 공부짓는 것[增上慧學, adhipaññā-sikkhā]이라고 천명하신다.
만일 출가자가 이러한 계․정․혜 삼학을 공부짓지 않는다면 그는 마치 ‘나는 소다.’라고 하면서 소의 무리를 따르는 당나귀와 같은 사문이어서 진정한 출가자라 할 수 없다고 준엄하게 말씀하신다. 참으로 출가자들이 깊이 명심해야 할 세존의 고구정녕하신 말씀을 담고 있는 귀중한 경이다.
⑿「외움 경」1/2/3(A3:85~87)
본경도 수행자에게는 중요한 경이다. 본경은 사소한 계율[小小戒]에 얽매이기 보다는 계․정․혜 삼학을 균등하게 닦아서 예류자, 일래자, 불환자, 아라한으로 정리되어 설명되고 있는 성자의 과위를 성취하는 것이 중요하다고 설하고 있다. 왜냐하면 높은 계를 공부짓고 높은 마음을 공부짓고 높은 통찰지를 공부짓는 삼학 속에 모든 학습계목은 포함되기 때문이라고 세존께서는 설명하신다.
사소한 계율에 얽매이지 말라 하셨다고 해서 만일 계율은 신경 쓰지 않아도 된다고 받아들인다면 그것은 세존의 금구성언을 잘못 이해하는 것이다. 본경은 절대로 파계자들과 파계를 꿈꾸는 자들에게 깃발이 되어주는 경이 아니기 때문이다.
⒀「소금 덩이 경」(A3:99)
본경에서 세존께서는 먼저 “‘그 사람이 어떤 업을 지었건 그대로 그것을 겪게 된다.’라고 한다면 청정범행을 닦음도 없고 바르게 괴로움을 종식시킬 기회도 없다.”고 말씀하시고, “‘그 사람이 어떤 형태로 겪어야 할 업을 지었건 그것의 과보를 겪게 된다.’라고 한다면 청정범행을 닦음도 있고 바르게 괴로움을 종식시킬 기회도 있다.”고 말씀하신 뒤에, 같은 업을 짓는데 왜 어떤 자에는 무거운 과보를 가져오고 어떤 자에게는 가벼운 과보를 가져오는가를 설명하고 계신다.
세존께서는 소금 덩이를 작은 물 잔에 넣으면 그 물은 엄청나게 짜게 되지만 큰 강에 넣으면 아무런 영향을 주지 못하는 비유와 동전 반개를 훔쳐서 감옥을 가기도 하고 동전 백 개를 훔쳐도 감옥에 가지 않는 등의 비유를 들어서 설명하고 계신다.
본경은 이처럼 왜 같은 업이지만 이렇게 다르고 다양한지를 이해할 수 있는 좋은 경이다. 이런 경들이 바탕이 되어서 아비담마와 주석서에서 업을 16가지 측면에서 설명한다고 여겨진다.
⒁「불순물 제거하는 자 경」(A3:100)
본경은 수행의 과정을 금이 든 광석을 채취하여 순금으로 만드는 여러 공정에다 비유하고 있는 중요한 경이다. 높은 마음을 닦는 비구는 먼저 몸과 말과 마음의 삼업을 맑히고 두 번째로는 감각적 욕망에 대한 생각, 악의에 대한 생각, 해코지에 대한 생각을 맑히고 세 번째로는 친지들에 대한 생각, 지역에 대한 생각, 불명예에 대한 생각을 떨쳐내고 네 번째는 법에 대한 생각을 정화한다. 여기서 법에 대한 생각이란 열 가지 위빳사나의 경계(오염원)에 대한 생각이라고 주석서에서 설명한다.
법에 대한 생각이 정화될 때 그는 최상의 지혜로 실현시킬 수 있는 법이라면 그것이 어떤 것이든지 간에 마음을 기울이면 언제든지 그것을 실현하는 능력을 얻게 된다. 이러한 능력을 바탕으로 신통변화[神足通], 신성한 귀의 요소[天耳界, 天耳通], 다른 중생들의 마음을 꿰뚫어 앎[他心通], 수많은 전생의 갖가지 삶들을 기억함[宿命通], 신성한 눈으로 중생들이 지은 바 업에 따라가는 것을 꿰뚫어 앎[天眼通], 마음의 해탈과 통찰지를 통한 해탈의 실현[漏盡通]이라는 여섯 가지 신통지(초월지)를 얻게 된다.
이렇게 말씀하신 뒤에 다음과 같은 수행에 요긴한 말씀을 하신다.
“높은 마음을 닦는 비구는 때때로 다음의 세 가지 표상을 마음에 잡도리해야 한다. 그는 때때로 삼매의 표상을 마음에 잡도리해야 하고, 때때로 정진의 표상을 마음에 잡도리해야 하고, 때때로 평온의 표상을 마음에 잡도리해야 한다.”
그리고는 이 셋을 조화롭게 닦을 것을 자세하게 말씀하신 뒤에 금세공인이나 그의 도제가 정제되지 않은 금을 잘 제련하여서 무엇이든 원하는 장신구를 만드는 비유를 들어서 설명하시고 경을 끝맺으신다.
이처럼 본경은 수행자가 삼업을 청정히 하는 것에서부터 시작하여 사성제를 관통하고 마음의 해탈과 통찰지를 통한 해탈을 구족하는 최종 단계인 누진통을 포함한 여섯 가지 신통지를 실현하는 수행의 전 과정을 금이 든 광석을 채취하여 순금을 만들어 원하는 장신구를 마음대로 만들어내는 금의 제련과정에 비유해서 설하고 있다.
특히 세 가지 표상에 관한 말씀과 금세공인의 비유가 들어있는 본경의 §§11~15(마지막)까지는『청정도론』VIII.74~76에 인용될 만큼 중요하게 취급되었던 가르침이기도 하다.『청정도론』에 인용된 부분은 본경의 삼분의 일 정도에 해당하는 많은 부분이다.
8. 맺는 말
본서에는『앙굿따라 니까야』의「하나의 모음」(A1)과「둘의 모음」(A2)과「셋의 모음」(A3)에 포함된 1021개의 경들이 수록되어 있다. 비록 경의 길이로는『디가 니까야』의 경들의 길이에 필적하는「팔관재계 경」(A3:70)과 같은 긴 경들도 포함되어 있고 하나의 문장으로 구성된 극히 짧은 경들도 있지만 “모든 부처님 가르침은 해탈의 맛으로는 하나이다.”(DA.i.16)라는『디가 니까야 주석서』의 설명처럼 본서에 포함된 경들은 단 하나의 예외도 없이 모든 중생들로 하여금 악도를 여의고 향상하여 해탈․열반이라는 최고의 가치를 실현하게 하시려는 자애와 연민이 가득한 말씀들이다.
부처님의 육성을 만난 것 같은 이러한 경들을 읽는 독자 모두 해탈․열반의 길로 함께 나아가는 좋은 친구[善友, kalyāna-mitta]가 되기를 기원해본다.
앙굿따라 니까야 (增支部, 숫자별로 모은 경) (1/2/3/4/5/6)
대림 스님 옮김/신국판(양장)
제1권(하나 ~ 셋의 모음): 664쪽 (초판 2006년, 3판 2012년)
제2권(넷의 모음): 656쪽 (초판 2006년, 재판 2012년)
제3권(다섯의 모음): 552쪽 (초판 2007년, 재판 2013년)
제4권(여섯~일곱의 모음): 576쪽 (초판 2007년, 재판 2013년)
제5권(여덟~아홉의 모음): 560쪽 (초판 2007년, 재판 2013년)
제6권(열~열하나의 모음): 624쪽 (초판 2007년, 재판 2013년)
정가: 각권 30,000원